उसकी मुक़द्दस मोहब्बत !

>> 26 December 2009

दूर तक उड़ते हुए गर्म हवा के बवंडर हुआ करते और धूप वहाँ अपनी रूमानियत नहीं फैलाती । याद थी जो हर वक़्त उसके दामन से लिपटी रहती । उन यादों को साथ ले अपनी चौखट पर खड़ी हो वो दूर तक तलाशती उस चेहरे को । उन सभी पलों में इंतज़ार की लम्बी घड़ियाँ हुआ करती, उस घडी में चाहत घुली हुई सी किसी और ही लिबास में दबे पाँव आती, घंटों यूँ ही उन घड़ियों को थामे हुए उसके आँचल के ज़िस्म पर चिपक जाती।

रात को अचानक से उन आये हुए ख्वाबों में अपनी उस चाहत का अक्स देखती और नींद टूटने पर वो उस अक्स को यहाँ-वहाँ खोजती । तब वो उठकर उस मुंडेर पर से ताका करती कि कहीं दूर उसके क़दमों की आहट तो नहीं । दूर उस अँधेरे में उसे दिखाई देता तो एक सन्नाटा और कुत्तों के हूकने के स्वर, जो उसके दुःख को और स्याह काला कर देते ।

भोर के पहले पहर ही जब हाथ की चक्की पर वो गेहूं को मुट्ठियों में भर भर उनको चक्की में डालती तो पिछले बरस की गेहूं की बालियों के पीछे खड़ा मुस्कुराकर देखता हुआ वो चेहरा आँखों के सामने आकर खड़ा हो जाता । गोबर के उपले बनाते हुए कब उन पर उस चेहरे को वो उतार देती, उसे पता ही ना चलता । जब मिट्टी के उस चूल्हे से गरम गरम रोटियाँ निकालती तो लगता कि सामने वो चेहरा है जो मुस्कुराते हुए उसकी रोटियों की तारीफ़ कर रहा है । अचानक से ही उसकी आँखें डबडबा जातीं । तब साडी के पल्लू से अपने आँख के किनोर को पौंछ एकपल को मुस्कुरा जाती ।

उसके दामन में जो उसके साथ के किस्से थे, उन्हें याद करती । अगले रोज़ फिर वही दूर तक उठते बवंडर, और गर्म रेतीली हवा । वही खाली चौखट जिन पर अपने क़दमों को रख वो हर रोज़ उस चेहरे के लौट आने की राह तकती । फिर वो पहर स्याह काला अँधेरा बनकर उस अक्स को साथ लाता और वही चेहरा बनकर, नींद में आँखों को भिगो जाता । तब मुंडेर पर से वो हर रोज़ रात उन क़दमों की आहट सुनना चाहती । उसे दूर तक सुनाई देता तो सिर्फ वो शोर और अपने वजूद को कायम रखतीं हुई स्याह काली रातें ।

हर रोज़ ये जानते हुए भी कि उसका पति उस दूर शहर से बहुत दिनों बाद लौटेगा, वो राह तकती, इंतज़ार करती ।काम की तलाश में गये अपने पति के हर रोज़ लौट आने की दस्तक जैसे उसे हर पल सुनाई देती । दूर उठते हुए बवंडर ऐसे जान पड़ते कि शायद उनके पीछे वो चेहरा है, जो अभी सामने आ जाएगा ।

ये जानते हुए भी कि अभी बहुत वक़्त है लौटकर आने में, वो हर दिन, हर पल, कभी चौखट पर तो कभी मुंडेर पर से उस चेहरे को तलाश करती है...

* मुक़द्दस = पवित्र
* चित्र गूगल से
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ज़िक्र (एक प्रेम कहानी)-अंतिम भाग

>> 22 December 2009

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कहते हैं कि ख्वाहिशों का कोई छोर नहीं होता । कहाँ शुरू होती हैं और कहाँ ख़त्म ये पता ही नहीं चलता । कुछ ख्वाहिशें तो ऐसी होती हैं कि खुद ख्वाहिशों को ख्वाहिश करने वाले से प्यार हो जाता होगा । सोचती होंगी कि कितना नेक बन्दा है जो दिल से इतनी मासूम सी ख्वाहिश करता है ।

कुछ रोज़ बाद जब सब कुछ तय हो गया कि कब लगन है और कब शादी होनी है तो सिद्धांत अपने दोस्त साकेत को फ़ोन करके बताता है कि उसकी शादी तय हो गयी है और उसे जरूर आना है । जब साकेत को पता चलता है कि लड़की कोई और नहीं विद्या है तो पहले तो वो बिलकुल हतप्रद रह जाता है फिर कहता है "तूने सब कुछ सोच समझ लिया है न कि तू क्या करने जा रहा है । तू खुद अपनी मर्ज़ी से ही शादी कर रहा है ना ।" इधर से सिद्धांत फ़ोन पर साकेत को अपनी बात पूरी तरह समझा देता है और उसे शादी के दिन उपस्थित रहने के लिये वादा लेता है ।

शादी का दिन नजदीक आने से पहले के सभी दिन एक एक करके बीतते जाते और हर रोज़ कुछ न कुछ आभास करा जाते । इन बीते हुए दिनों में कभी ऐसा दिन नहीं आया कि सिद्धांत और विद्या की बात हुई हो । कभी सिद्धांत सोचता भी बात करने की लेकिन यह सोचकर रह जाता कि पता नहीं कहीं विद्या असहज महसूस ना करे और अगर विद्या बात करना चाहेगी तो फ़ोन कर ही लेगी । दिन थे कि बीते तो बीतते ही गये और अपने साथ लेते गये तमाम सवाल, तमाम यादें, तमाम एहसास जो सिद्धांत ने विद्या के बारे में सोचकर गुजारे थे ।

उधर विद्या कभी सोचती कि मैं सिद्धांत को फ़ोन करूँ कि ना करूँ । तो क्या हुआ जो हमने शादी से पहले बात ना की । हमारे माता-पिता भी ने तो शादी से पहले बात नहीं की थी । जितना किसी को जानना है वो शादी के बाद भी जाना जा सकता है । अब तो शादी हो ही रही है । जब किसी को जानकर भी कोई धोखा देकर चला जाता है तो फिर जान-पहचान से भी क्या हासिल ?

अंततः वह दिन आ ही जाता है जब मंडप में बैठकर पंडित सिद्धांत को विद्या के गले में मंगलसूत्र पहना देने के लिये कहते है । जब मंडप में अग्नि के सात फेरे लेते हुए दोनों आगे पीछे एक दूजे से जुड़े हुए चल रहे हैं । जब पंडित जी कहते हैं कि विवाह संपन्न हुआ और जब सभी बड़े-बुजुर्ग अपनी अपनी शुभकामनाएँ देते हुए फूलों की बारिश से उन दोनों का नये जीवन में स्वागत करते हैं ।

विद्या को अपने घर में पाकर सिद्धांत की माँ ख़ुशी से भावविभोर हो जाती हैं । घर के मुख्य दरवाजे पर ही दोनों की बालाएं लेती हैं और गृहप्रवेश की रस्म अदायगी के बाद विद्या को नये सजे हुए कमरे में ले जाया जाता है । एकपल तो सिद्धांत की माँ को विश्वास ही नहीं होता कि उसके बेटे की शादी हो गयी है और इतनी खूबसूरत चाँद सी बहू घर आ गयी है । उस रोज़ सिद्धांत की माँ के भावविभोर होकर आँखों से आंसू निकल आते हैं और वो विद्या से कहती हैं "बेटी मैं बहुत खुशनसीब हूँ जो तुम मेरे घर बहू बन के आयी । मेरे घर में एक बेटी की कमी थी जो तुमने आकर पूरी कर दी । मुझे हमेशा अपनी माँ ही समझना और देखना अगर कभी बेटी समझ कर गुस्सा करूँ तो बुरा मत मानना । विद्या भी उनकी डबडबाई आँखों को देख उनके गले लग जाती है और कहती है "खुशनसीब तो मैं हूँ माँ जो एक माँ को छोड़कर आयी तो मुझे यहाँ दूसरी माँ मिल गयी ।"

तभी सिद्धांत के पिताजी बाहर से मजाक के लहजे में आवाज देते हैं "अपनी बहू के आ जाने के बाद, क्या इस बूढ़े की भी सुनोगी ।" सिद्धांत की माँ कहती है "खबरदार जो खुद को बूढा कहा तो । तो क्या हुआ जो बेटे की शादी कर ली । अभी तो अच्छे अच्छे तुम्हारे आगे कुछ नहीं ।" और हंसती हुई चली जाती हैं । विद्या दोनों की बातें सुनकर मुस्कुरा उठती है । यहाँ अपने माँ-बाप की ही तरह के इंसान पाकर वो एक पल को अपने घर को भूल जाती है ।

सूरज के ढलने के साथ ही रात करवट बदलती है और अपनी चाँदनी बिखेर देती है । सिद्धांत को उसके कमरे में भेजा जाता है । दरवाजे पर क़दमों की आहट पाकर बिस्तर पर बैठी विद्या कुछ सकुचा सी जाती । सिद्धांत कमरे में प्रवेश करता है तो देखता है कि विद्या घूँघट डाले हुए बैठी है । साथ ही ये भी देखता है कि विद्या बहुत ही असहज महसूस कर रही है । ख़ामोशी तोड़ने के लिये सिद्धांत खड़े हुए ही बोलता है "ये घूँघट क्यों डाला हुआ है तुमने ? मैं तो तुम्हें बहुत पहले से देखता आ रहा हूँ ।" विद्या घूँघट के अन्दर से ही कहती है " वो माँ ने कहा है कि ये रस्म है और वो ही घूँघट डाल गयी हैं, कह रही थी कि आप आकर घूँघट उठाओगे तो रस्म पूरी होगी ।"

सिद्धांत हँसता है "अच्छा, बड़े रस्मों-रिवाज माने जा रहे हैं । क्या बात है । तो माँ का कहना माना जा रहा है । ठीक है लीजिये घूँघट उठा देते हैं ।" कहता हुआ सिद्धांत विद्या का घूँघट उठा देता है और कहता है "शुभान-अल्लाह, आज चाँद सीधे मेरे कमरे में निकल आया है, देखूँ तो कहीं बाहर काली रात तो नहीं ।" विद्या इस बात पर थोडा मुस्कुरा सी जाती है । साथ ही साथ विद्या का दिमाग तमाम सवालों में उलझा हुआ था । कभी इस उधेड़बुन में वो अपने पैरों की उँगलियों को सिकोड़ती तो कभी अपनी गर्दन नीचे कर लेती । सिद्धांत विद्या की उधेड़बुन को भाँप लेता है और उठता हुआ कहता है "तुम्हें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं विद्या, ये एक रस्म अदायगी थी जो मैंने पूरी कर दी । इसके आगे में जानता हूँ कि मेरी अभी सीमा कहाँ तक है । मैं जानता हूँ कि मैं भी चाहूँ तो और पुरुषों की तरह इस रात उसी तरह का बर्ताव कर सकता हूँ लेकिन मैं वैसा इंसान नहीं हूँ । दो जिस्मों के मिलन से ज्यादा पाक होता है दो आत्माओं का मिलन और जिस दिन तुम अपनी आत्मा से मुझे कबूल कर लोगी उस रोज़ तुम सहज महसूस करोगी । तब मुझे न तो कुछ कहने की जरूरत पड़ेगी और ना ही कुछ करने की । सब कुछ सहज रूप से हो जाएगा ।"

सिद्धांत सामने रखी हुई कुर्सी पर बैठ जाता है और उपहार में मिले कार्ड देखने लगता है । तभी उसके हाथ से बिस्तर पर छूटी हुई दो टिकटों को उठाकर विद्या देखती है और कहती है " ये टिकट ?" सिद्धांत कहता है "हाँ वो साकेत ने ऊटी के दो हनीमून टिकट दिये हैं और वहाँ होटल में ठहरने का एक हफ्ते का इंतजाम किया है । मैंने उसे मना भी किया लेकिन वो माना ही नहीं । विद्या कहती है "क्यों ?" सिद्धांत बोला "मैंने सोचा पता नहीं तुम शायद न जाना चाहो ।" विद्या कुछ नहीं कहती और खामोश हो जाती है । सिद्धांत कहता है "चलना चाहोगी ?" विद्या कहती है "अब जब टिकट हैं ही तो फिर मना करने से क्या फायदा । आपके दोस्त का नुकसान ही होगा ।" सिद्धांत मुस्कुराते हुए कहता है "ये भी खूब कही तुमने ।"

फिर दोनों के बीच ख़ामोशी छा जाती है । सिद्धांत रखे हुए कार्ड देखने लगता है और विद्या किसी सोच में चली जाती है । थोड़ी देर बाद विद्या कहती है "एक बात कहूँ " सिद्धांत कार्ड देखते हुए ही कहता है "ह्म्म्म, कहो ।"
विद्या कहती है "मैं अपने अतीत के बारे में सब कह देना चाहती हूँ ।" सिद्धांत कहता है "मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि मुझे तुम्हारे अतीत से कोई जान पहचान नहीं करनी और उसे जानकर होगा क्या ?" विद्या कहती है "अगर मैं कहूँ कि अब मैं ठीक झरने के गिरने के बाद से बनी हुई पवित्र नदी नहीं हूँ तो ?" सिद्धांत कार्ड को रखता है और विद्या की ओर देखकर कहता है "पवित्रता और अपवित्रता की परिभाषा किसी की वर्जिनिटी से नहीं दी जा सकती और ना ही मैं वो पुरुष हूँ जो ठीक झरने के गिरने के बाद से बनी हुई नदी में नहाने की चाह रखता हो । मैं तो कहूँगा कि पवित्र नदी की चाह रखने वाले और उसमें स्नान करने वाले स्वंय अपनी पवित्रता का आंकलन करना क्यों भूल जाते हैं ?क्यों पवित्र नदी में अपनी अपवित्रता धोकर पवित्र होना चाहते हैं स्नान करने वाले । चिंता मत करो मुझे तुम्हारी वर्जिनिटी से तुम्हारी पवित्रता का आंकलन नहीं करना । तुम अगर आत्मा से पवित्र हो तो ही तुम मेरे लिये पवित्र कहलोगी ।" विद्या सिद्धांत की ओर देखती ही रह जाती है ।

सिद्धांत कहता है "अब तुम सो जाओ थक गयी होगी ।" विद्या लेट जाती है और कुछ सोचती सी, किसी उधेड़बुन में कब सो जाती है उसे पता ही नहीं चलता । जब सुबह के समय उसकी आँख खुलती है तो देखती है कि सिद्धांत कुर्सी पर बैठा हुआ ही सो गया है । विद्या उठकर सिद्धांत के बाजू पर हाथ रखती है और कहती है "सिद्धांत आप सारी रात यहीं कुर्सी पर सोते रहे । वहाँ बिस्तर पर सो जाइए ।" सिद्धांत उठकर बिस्तर पर लेट जाता है और विद्या कमरे के बाहर चली जाती है । करीब दो घंटे बाद विद्या चाय लेकर आती है और सिद्धांत को जगाती है "चाय पी लीजिए" सिद्धांत उठता है और देखता है कि विद्या नहाने के बाद गीले बालों में उसके सामने चाय का प्याला लेकर खड़ी हुई है । एक भीनी-भीनी खुशबू से पूरा कमरा भर जाता है । विद्या खिड़की का पर्दा हटाती है तो सूरज खिलखिलाता हुआ मुस्कुराता है । सिद्धांत चाय के प्याले को होठों तक ले जाते हुए सूरज को देखता है तो उसे एक पल लगता है कि जैसे सूरज ने मुस्कुराते हुए एक आँख मारी हो ।

सिद्धांत चाय ख़त्म हो जाने के बाद उठता है और तौलिया उठाकर नहाने चल देता है । नहा लेने के बाद अपने गीले बाल झाड़ता हुआ कमरे में आता है और विद्या से पूँछता है "तुम्हारी कब तक की छुट्टी है ?" विद्या कहती है "क्यों ?" सिद्धांत तौलिया रखते हुए कहता है "वो ऊटी वाला किस्सा याद है या भूल गयीं ?" विद्या कहती है "ओह, हाँ, अभी 10 दिन की छुट्टी और है ।" सिद्धांत कहता है "तब ठीक है । वैसे हमें कल ही निकलना होगा ।"

अगले रोज़ सिद्धांत और विद्या हवाई जहाज से सफ़र कर ऊटी की धरती पर कदम रख देते हैं । वहाँ के मनमोहक दृश्य, खूबसूरत आसमान, ताज़गी और खुशनुमा माहौल दिल में बस जाता है । होटल मैं पहुँच जब विद्या खिड़की खोलती है तो उसके सामने दूर तक फैले बादल ही बादल दिखाई दे रहे थे । सफ़ेद, ऐसे जैसे आच्छादित होकर अपने होने का एहसास करा रहे हों । विद्या उन्हें देखकर खुश हो जाती है । सिद्धांत कमरे में सामान रखकर बैठ जाता है । कुछ देर में कमरे का रख रखाव करने वाला नौकर आता है और कहता है "सर कुछ चाहिए ?" सिद्धांत विद्या की ओर देखकर कहता है "मेरे लिये एक कॉफी और मेमसाहब से पूँछो ।" विद्या कहती है "मैं भी कॉफी ही लूंगी ।"

थोड़ी देर में कॉफी आ जाती है । विद्या खिड़की के पास खड़े हुए ही कॉफी पीने लगती है और कभी बादलों को देखती है तो कभी दूर तक फैली हरियाली को । सिद्धांत कहता है "अभी कुछ घंटे में हमे बाहर घुमाने ले जाने वाले आएगा । तब तक चाहो तो आराम कर लो । मैं नहा लेता हूँ । तुम भी चाहो तो नहा लेना ।" विद्या कहती है "ठीक है ।"

थोड़ी देर में ही सिद्धांत नहा कर बाहर आ जाता है । विद्या नहाने चली जाती है और जब उन भीगे बालों और नन्ही नहीं बूंदों से भीगे हुए सूट को पहने बाहर निकलती है तो सिद्धांत की नज़र ना चाहते हुए भी उस पर टिकी ही रह जाती है । विद्या की नज़रें जब सिद्धांत को देखती हैं तो सिद्धांत कुछ झेंप सा जाता है और खिड़की के बाहर की ओर देखने लगता है । विद्या आईने के सामने खड़ी होकर अपने बाल सुखाने लग जाती है । सिद्धांत खिड़की के बाहर दूर तक फैले बादलों को देखकर कहता है "कितने खूबसूरत बादल है ? है ना" विद्या जवाब देती है "ह्म्म्म"

फिर सिद्धांत विद्या की ओर देखता है और कहता है "तुम्हें पता है कि बादल इतने सफ़ेद क्यों दिखाई देते हैं ? उजले उजले से, दूर तक फैले से ।" विद्या कहती है "क्यों ?" सिद्धांत कहता है "क्योंकि ये बहुत नेक दिल होते हैं, स्वार्थी नहीं होते और हमेशा देते हैं, कभी किसी से कुछ नहीं माँगते । अपने को फना कर देते हैं और इस प्यासी जमीन को अपना सर्वस्व दे देते हैं ।" विद्या सिद्धांत को एकपल देखकर मुस्कुरा जाती है और अपने बाल बाँध लेती है ।

सिद्धांत कहता है "कुछ खाना है तो नीचे चलते हैं या चाहो तो यहीं कमरे में मँगा लेते हैं ।" विद्या कहती है "प्लीज यहीं मँगा लो । वैसे भी बहुत थकान हो गयी है ।" सिद्धांत फ़ोन करके खाना लाने को कह देता है । दोनों खाना खाते हैं और खाना खाने के बाद सिद्धांत टीवी के चैनल बदल ही रहा था तभी उन्हें बाहर घुमाने ले जाने वाला दरवाजे पर दस्तक देता है । सिद्धांत उसे नीचे इंतज़ार करने के लिये कहता है और कुछ देर बाद विद्या को साथ लेकर पर्यटन के लिये निकल जाते हैं ।

दो-तीन रोज़ ऐसे ही गुजर गये । दिन बाहर घूमने में निकल जाता और रात उस बिस्तर पर एक दूसरे से दूरी बनाकर सोने में । उस चौथी शाम जब सिद्धांत किताब पढने में तल्लीन था और विद्या टीवी के चैनल बदलने में तो विद्या अचानक से कहती है "सिद्धांत, आप तो खूबसूरत भी हैं, दिल के भी नेक हैं और इतनी अच्छी बातें भी कर लेते हैं । क्या आपको कभी किसी से प्यार नहीं हुआ ?" सिद्धांत जो किताब में खोया हुआ था । विद्या के इस सवाल ने उसे अन्दर तक झकझोर कर रख दिया । सिद्धांत मन ही मन सोचने लगा कि विद्या को तो कुछ पता ही नहीं या कहीं ऐसा तो नहीं कि इसे पता हो लेकिन ये मेरे मुँह से सुनना चाहती हो ।

सिद्धांत कहता है "नहीं मैंने कभी किसी को नहीं चाहा" विद्या कहती है "पर गर्ल्स हॉस्टल में तो तमाम लडकियां आपके गुण गाती थीं। आपको पसंद करने वाली तमाम थीं ।" सिद्धांत मुस्कुराते हुए कहता है "अच्छा, मुझे तो पता ही नहीं था । क्या वाकई ऐसा था ?" विद्या कहती है "हाँ, क्यों किसी ने आपके सामने अपने प्यार का इजहार नहीं किया ।" सिद्धांत कहता है "हाय री किस्मत" और फिर दोनों हँसने लगते हैं ।

अगले दो रोज़ भी बाहर घूमने में निकल जाते हैं जिसमें वो चर्च जाते हैं, कुछ कपडे खरीदते हैं, कई बार सिद्धांत विद्या से बार बार पूँछ पूँछ कर खाने की चीज़ें लेता है । विद्या का पूरा ख्याल रखता है और विद्या भी सिद्धांत के साथ घुलने मिलने सी लगती है । उस रात बिस्तर पर दोनों के बीच उतनी ही दूरियां थी जितनी कि पहले हुआ करती थीं । रात को सोते हुए ना जाने कैसे सिद्धांत का एक हाथ करवट लेते हुए विद्या के गले के नीचे पहुँच गया । जिसका ना तो सिद्धांत को होश था और ना ही उसका ऐसा कोई उसका इरादा था । अचानक से विद्या की नींद खुल जाती है और जब देखती है कि सिद्धांत का हाथ उसके सीने पर रखा हुआ है तो वो सिद्धांत का हाथ झटक कर फैंकती है । सिद्धांत की नींद खुल जाती है । विद्या उठ कर बैठ जाती है । सिद्धांत कहता है "क्या हुआ ? कैसे बैठी हो ?"

विद्या कहती है "सब मर्द एक जैसे ही होते हैं । कुछ बातें तो अच्छी अच्छी करना जानते हैं लेकिन अंततः चाहते वो भी वही हैं । स्त्री को भोगना ।" विद्या की बात सुनकर सिद्धांत को समझने में ज़रा भी देर नहीं लगती कि उसने उसका हाथ क्यों झटका था । सिद्धांत कहता है "सॉरी, मुझे कुछ पता नहीं चला और ना ही मेरा ऐसा कोई इरादा था । " विद्या कहती है "मैंने आप से कुछ हँस बोलकर बात क्या कर ली । आपसे घुल मिल क्या गयी । आपने सोचा कि चलो अब सब आसान हो गया ।" सिद्धांत बोला "क्या कहती जा रही हो तब से । मैंने बोला ना सॉरी, मैंने कुछ जान बूझ कर नहीं किया ।" विद्या कहती है "जानते हो मेरा पिछला अतीत क्या है ? मेरा पिछला अतीत यही था कि वो भी मुझे भोगना चाहता था । फर्क सिर्फ इतना है कि वो मुझे शादी से पहले ही प्यार का वास्ता देकर भोगना चाहता था । इसी लिये जब मैंने उसे मना किया तो उसने मुझसे रिश्ता ख़त्म कर कहीं और शादी कर ली ।" सिद्धांत बोला "देखो विद्या, मैं मानता हूँ कि मुझसे अनजाने में गलती हुई है । उसके लिये मैं माफ़ी चाहता हूँ ।" विद्या कहती है "मैं कल ही घर वापस जाना चाहती हूँ ।" सिद्धांत कहता है "ठीक है, जैसा तुम चाहो ।"

अगले रोज़ सिद्धांत विद्या को लेकर वापस अपने घर आ जाता है । सिद्धांत की माँ दोनों से बारी बारी पूंछती है कि वो दोनों दो दिन पहले कैसे आ गये । कोई बात है क्या ? मगर दोनों ने यही कहा कि "बस जी भर गया था और आपकी याद आ रही थी इसीलिए चले आये"

अगले रोज़ विद्या अपने माता-पिता के घर चली जाती है । वहाँ जाने से पहले सिद्धांत की माँ कहती है कि अपनी नौकरी पर जाने से पहले यहाँ होकर ही जाना और देख जल्द से जल्द कोशिश कर कि तेरा तबादला भी यहीं हो जाए, इसी शहर में ।" विद्या जाते हुए कहती है "ठीक है माँ"

सिद्धांत अपने कॉलेज के काम के सिलसिले में कुछ रोज़ के लिए दूसरे शहर चला जाता है । माँ के कई बार पूँछने पर भी वो माँ को कुछ नहीं बताता कि उन दोनों के बीच कुछ गड़बड़ है । उधर सिद्धांत के चले जाने और विद्या की छुट्टियाँ ख़त्म होने के दौरान विद्या अपनी ससुराल, माँ से मिलने आती है । उसे देखकर माँ बहुत खुश होती हैं ।
माँ कहती है कि "अब आज यहीं रुक जाना विद्या । कल सुबह यहीं से चली जाना । विद्या चाहते हुए भी माँ की बात नहीं टाल पाती और वहीँ रुक जाती है ।

रात के 2 बजे विद्या किसी उधेड़बुन में थी, कुछ सोचती सी, उसे नींद नहीं आ रही थी । उसे ऊटी की सिद्धांत के साथ की हुई बातें रह रह कर याद आ रही थीं । वो हंसी की गूँज, वो आपस में खेली अन्ताक्षरी, वो साथ घूमना और उसकी खुद की पसंद का खाना खाना और फिर अंततः उस रात का अंतिम दृश्य जो सामने आता तो विद्या परेशान हो उठती । तभी वो बिस्तर से उठ कमरे में टहलने लगती है । विद्या की नज़र उस डायरी पर जाती है । विद्या उसे उठकर पढने लगती है । एक एक अल्फाज़ , एक-एक पंक्ति पढ़ डालती है । हर अल्फाज़ अपनी कहानी कह रहा था । उस पहले रोज़ से लेकर जब सिद्धांत ने पहली बार विद्या को देखा था, उस आखिरी रोज़ तक जब सिद्धांत ने सारी रात उस रेस्टोरेंट के बाहर इतंजार में गुजारी थी ।

विद्या बहुत रोती है । बहुत देर तक रो लेने के बाद बार बार उसके दिल में यही ख़याल आता कि मैंने उस इंसान का दिल दुखाया जिसने मुझे चाहने के अलावा अपनी जिंदगी में कुछ नहीं किया । कभी उसने दर्द से उफ़ तक नहीं किया । मैं उस आखिरी रोज़ भी उससे ना मिल सकी थी जब अचानक उसकी रूममेट की तबियत खराब हो गयी थी और ऊटी की आखिरी रोज़ का दिया हुआ दर्द भी तो कुछ कम नहीं । वो जानती थी कि सिद्धांत चाहता तो दूसरे पतियों की तरह अपनी पत्नी को हासिल कर सकता था लेकिन वो कितना नेक और शरीफ है । हर पल विद्या का सिद्धांत के बारे में ही सोचते हुए कट जाता है ।

सुबह विद्या खुद को कुर्सी पर पाती है । फ़ोन की घंटी बज रही थी । विद्या ने सोचा कि शायद सिद्धांत का फ़ोन हो । अगर उसका फ़ोन हुआ तो वो उससे माफ़ी माँगेगी । लेकिन जब फ़ोन उठाया तो उधर से साकेत की आवाज़ थी "कैसी हो विद्या ? तुम लोग इतनी जल्दी वहाँ से क्यों आ गये ? मैंने सिद्धांत से भी पूंछा उसने कुछ नहीं बताया । क्या बात है ? कोई अनबन तो नहीं हो गयी " और फिर बातों ही बातों में साकेत ने विद्या को सिद्धांत के दिल का सारा हाल कह सुनाया ।

अब विद्या खामोश चुपचाप माँ के पास जाती है और कहती है "माँ मैं अभी नहीं जाऊँगी कुछ रोज़ बाद जाऊँगी, जब सिद्धांत आ जायेंगे तब ।" सिद्धांत की माँ कहती है "जैसी तेरी मर्ज़ी बेटा, मुझे तो ख़ुशी मिलेगी जो तुम और दिन रुकोगी तो" विद्या फ़ोन करके अपने कार्यालय वालों से और छुट्टी माँग लेती है ।

इन चन्द दिनों मैं हर पल विद्या सिद्धांत के फ़ोन का इंतज़ार करती लेकिन सिद्धांत का कोई फ़ोन नहीं आया । विद्या में इतनी हिम्मत नहीं थी कि उसे फ़ोन कर ले । विद्या तो बस इंतज़ार कर रही थी उस घडी का जब सिद्धांत आएगा और विद्या उससे माफ़ी माँगेगी और उसके सीने से लग कर जी भर कर रो लेगी । हर दिन आता और अपने साथ इंतज़ार की घड़ियाँ लेकर आता । अंततः 1 सप्ताह बाद सूरज के ढलने के साथ ही सिद्धांत के कदम घर के दरवाजे पर दस्तक देते हैं ।

रात का पहर अपने पाँव पसार चुका था और चाँद भी मानो जैसे मुस्कुरा रहा हो । सिद्धांत को उसकी माँ नहीं बताती कि विद्या अभी मौजूद है और अपने कमरे में ही है । विद्या ने माँ से मना कर रखा था और विद्या के कहने के अनुसार माँ ने सिद्धांत को कुछ नहीं कहा । सिद्धांत अपने कमरे में प्रवेश करता है तो सामने सजी-सँवरी विद्या को पाता है । सिद्धांत कहता है "विद्या तुम ? तुम अभी तक गयी नहीं ?" विद्या बिना कुछ बोले सिद्धांत के सीने से लग जाती है और रोने लगती है । रोते रोते कहती है "मुझे माफ़ कर दो सिद्धांत । मैं नहीं जानती थी कि आप मुझसे इतनी मोहब्बत करते हो । मुझे इतना चाहते हो । मैंने तो तब जाना जब आपकी वो डायरी पढ़ी और जब साकेत से बात हुई ।" सिद्धांत विद्या की पीठ पर हाथ रखता है और कहता है "रोती क्यों हो पगली ? अब तो मैं आ गया हूँ ना और मुझे तुमसे कोई गिला-शिकवा नहीं है ।" विद्या कहती है "नहीं मुझसे गलती हुई है । जब तक मुझे माफ़ नहीं करोगे तब तक मैं यूँ ही रोती रहूंगी ।" सिद्धांत कहता है "अच्छा बाबा, माफ़ किया अब खुश । अब तो चुप हो जाओ ।" विद्या हँस देती है और उसके सीने से कसकर अपनी बाहों को बाँध लेती है । सिद्धांत नियंत्रण सा खो देता है और विद्या को लेकर धडाम से बिस्तर पर गिरता है । विद्या सिद्धांत के होठों पर अपने होठ रख देती है ।

तब कमरे की सारी औपचारिक सुगंध कहीं और उड़ गयी थी । अब थी तो बस साँसों के उठने और गिरने की लय और एक दूजे के बदन की महक । शरीर अपनी कुदरती महकों के साथ, नदियों की तरह उमड़ कर एक होते हुए बहने लगे थे ।

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ज़िक्र (एक प्रेम कहानी)-भाग 2

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सर्दियों की गुनगुनी धूप थी, आसमान पंक्षियों के होने से और भी ज्यादा खूबसूरत लग रहा था । पेड़ों ने अपना पुराना लिबास उतारकर नया धारण कर लिया था और उसमें वो कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रहे थे । कहीं दूर से भीगी हुई धरती की भीनी-भीनी महक आ रही थी, जैसे हवाओं में घुल सी गयी हो ।

सिद्धांत एक कुर्सी पर अधलेटा सा पैरों को पसारे हुए, सीने पर किताब को उलट कर रखे हुए किसी सोच में उन पंक्षियों को निहार रहा था । छत पर क़दमों ने दस्तक दी । "सिद्धांत, बेटा क्या सोच रहा है ?" छत पर मिर्चों को पसारते हुए सिद्धांत की माँ बोलीं। सिद्धांत का ध्यान टूटता है और कहता है "ह्म्म्म, कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं ।"
"बेटा मुझे कुछ तुझ से बात करनी थी । कल रात ही कहना चाहती थी लेकिन तू जल्दी सो गया तो मैंने सोचा कि कल ही कहूँगी । " सिद्धांत की माँ उठकर उसके पास सामने की कुर्सी पर बैठ गयीं । सिद्धांत बोला "क्या बात करनी थी ? बोलिए ।" सिद्धांत की माँ ने सिद्धांत को एक नज़र प्यार से देखा और कहा "देख बेटा हम जानते हैं कि तुम फिलहाल शादी नहीं करना चाहते । लेकिन मेरे और अपने बाबू जी के बारे में भी तो सोच । माना वो तुझसे कुछ कहते नहीं लेकिन हर बाप का मन करता है कि उसके लड़के की शादी हो, बारात चढ़े, शहनाई बजे । एक माँ भी यही सब चाहती है । देख बेटा उनके किसी दोस्त के दोस्त की एक लड़की है । वो चाहते हैं कि हम सब वहाँ जाकर एक दूसरे को देख ले, समझ लें और सच तो यही है कि मैं भी चाहती हूँ । अच्छे लोग हैं तो बात चलाने में हर्ज़ ही क्या है ? बेटा अब हमारी खातिर ही लड़की देख लो और पसंद आने पर शादी कर लो ।" सिद्धांत अपनी माँ की ओर देखता है और मुस्कुराकर कहता है "बस इतनी सी बात । ठीक है कब चलना है, उनके यहाँ ?" सिद्धांत की माँ खुश होकर कहती है "कल चलना है । कल सोमवार है । कल दिन भी शुभ है ।"

कुछ एहसास जो बहुत कहीं पीछे छूट गये हों, वो अचानक से सामने आकर अगर दामन थामने लगे तो उस पल समझ नहीं आता कि आखिर वो रब चाहता क्या है ? आखिर उसकी मंशा क्या है ? उसने मुझे ही क्यों चुना इन सबके लिये ।

ऐसा ही तो महसूस कर रहा था सिद्धांत जब लड़की वालों के यहाँ पहुँचकर जो लड़की उसके सामने आयी वो कोई और नहीं विद्या थी । एक पल को सिद्धांत पिछली जिंदगी में चला गया । वो हॉस्टल, वो डायरी, वो क्लास, वो विद्या की मुस्कराहट, वो ढेर सारी रातें और वो ढेर सारे अल्फाज़, उसके चेहरे के सामने आकर खड़े हो गये । उसे लगा कि ये विद्या नहीं हो सकती । उसने फिर से कोशिश की, सामने आयी हुई लड़की को ठीक से देखने की । हाँ ये विद्या ही तो थी, जो उसके सामने खड़ी थी । ठीक उस रोज़ के बाद जब वो पुस्तकालय में मिली थी । जिंदगी भी क्या क्या अजीब मोड़ पर आकर रूकती है और ये ऊपर वाला भी ना जाने किन बीते हुए दिनों का ज़िक्र यूँ कर देता है, एक पल को तो विश्वास ही नहीं होता ।

उधर विद्या, सिद्धांत को देखकर कुछ असहज सी महसूस करने लगी थी । वही सिद्धांत जो कॉलेज के दिनों में हर लड़की को पसंद था । सभ्य, समझदार, शांत और बिलकुल नेकदिल । हाँ सभी तो जानते थे सिद्धांत के बारे में । लेकिन उसे तो कुछ और ही चाह थी । इन्हीं बातों में खोयी हुई विद्या लौटकर अपने घर बैठे उन लोगों के बीच खुद को पाती है ।

विद्या की माँ सिद्धांत से कहती है "बेटा कुछ लो, तुम तो तब से यूँ ही बैठे हुए हो । चाय ठंडी हो रही है, ये मिठाई भी खाओ बेटा " सिद्धांत चाय उठा लेता है । सिद्धांत के माता-पिता विद्या से बातें करते हैं । विद्या के पिताजी और माँ सिद्धांत से बातें करते हैं । कुछ समय यूँ ही गुज़र जाता है । सभी जानते थे कि विद्या खूबसूरत है और उसे नापसंद करने का कोई कारण नहीं हो सकता । तभी सिद्धांत के पिताजी के दोस्त, विद्या के पिताजी की ओर देखते हुए कहते हैं कि "लड़का-लड़की चाहे तो आपस में बात कर सकते हैं, क्यों गलत तो नहीं कहा ना मैंने किशोर जी"

"हाँ-हाँ क्यों नहीं, हमें कोई एतराज नहीं, आखिर जिंदगी भर का मामला है । आपस में लड़का-लड़की को बात तो करनी ही चाहिए ।" विद्या के पिताजी कहते हैं और फिर सब वहाँ से उठकर बाहर के बागीचे में चले जाते हैं ।

अब उस मेहमानों के कमरे में सिर्फ विद्या और सिद्धांत थे । दोनों को यूँ लग रहा था कि ये जिंदगी का सबसे कठिन दौर है जो अचानक से उनके सामने आ गया है । दोनों ही सोच रहे थे कि मैं क्या कहूँ ? क्या बात करूँ ? दो इंसान जो एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे, उनके पास आज शब्द नहीं थे इस ख़ामोशी को तोड़ने के लिये ।

तब सिद्धांत कमरे की पेंटिंग की ओर इशारा करते हुए कहता है "ये पेंटिंग बहुत खूबसूरत है, नहीं ?" विद्या पेंटिंग की ओर झिझकते हुए देखती हुई कहती है "हाँ" फिर मन ही मन सोचती है कि आखिर ये उसे क्या हो गया है ? ये पेंटिंग तो कभी उसने ही बनायीं थी और आज कोई उसकी प्रशंसा कर रहा है तो उसके पास शब्द नहीं है प्रतिउत्तर में कहने के लिये ।

फिर विद्या बोलती है "आप चाहो तो मैं ही मना कर दूँगी ताकि आपके घरवालो को बुरा न लगे कि आपने शादी के लिये मना कर दिया" सिद्धांत, विद्या की ओर देखकर कहता है "क्यों तुम शादी नहीं करना चाहती या मुझसे ही शादी नहीं करना चाहती ?" विद्या कुछ शांत सा हो जाती है फिर कहती है कि "नही, ऐसी तो कोई बात नही" सिद्धांत कहता है "कैसी ? कि शादी करना चाहती हो मगर मुझ से नही" विद्या कहती है "शादी तो करनी ही है । क्योंकि मैं नही चाहती कि मेरे माता-पिता मेरी वजह से परेशान रहे ।" सिद्धांत मुस्कुराते हुए कहता है "ठीक मेरी तरह" विद्या एकपल को सिद्धांत की ओर देखती है ।

सिद्धांत कहता है "देखो विद्या मुझे नही पता कि तुम्हारा अतीत क्या रहा । लेकिन एक बात जानता हूँ कि तुम अगर चाहो तो साफ़ साफ़ मना कर सकती हो और मुझे बुरा नही लगेगा । मेरा क्या है, मुझे तो शादी करनी ही है । वो तो किसी भी सुन्दर, पढ़ी लिखी और अच्छे परिवार की लड़की को देखकर मेरे घरवाले करना चाहते हैं । तुम मना कर दोगी तो कहीं और हो जायेगी ।" विद्या, सिद्धांत की एक एक बात सुन रही थी और उसकी नज़र कहीं शून्य में गुम थी । वो वहीँ मौजूद होते हुए भी खुद को ना जाने कहाँ पा रही थी । तब तक उन दोनों के माँ-बाप वहाँ आ जाते हैं । सिद्धांत के पिता के दोस्त बोलते हैं "तो क्या बात हुई ? क्या निष्कर्ष निकला बात करके ?"

सिद्धांत थोडा सा मुस्कुराता है और विद्या उठकर खड़ी हो जाती है । सिद्धांत की माँ कहती है "बैठो ना विद्या ।" विद्या बैठ जाती है । सिद्धांत के पिता के दोस्त सिद्धांत से कहते हैं कि "तो महाशय क्या जवाब है आपका ?" सिद्धांत विद्या की और देखने लगता है । विद्या उठकर जाने लगती है । सिद्धांत की माँ कहती है "देखो जी हमें तो लड़की बहुत पसंद है । सिद्धांत के पिताजी की ओर देखते हुए कहती हैं "क्या कहते हो जी ?" सिद्धांत के पिताजी कहते हैं "हाँ जी बिलकुल । हमें तो लड़की पसंद है । हमें कोई ऐतराज़ नही । बाकी लड़का और लड़की जाने ।"

सिद्धांत की माँ कहती है "सिद्धांत, बेटा बताओ कुछ । तुम्हारा मन क्या कहता है ?" सिद्धांत सामने लगी पेंटिंग की ओर देखता है फिर अपनी माँ की ओर देखकर कहता है "माँ अगर विद्या को सब पसंद है, वो अगर शादी करना चाहती है तो मुझे कोई ऐतराज़ नही । आप विद्या से पूँछ कर जवाब दीजिएगा ।"

सिद्धांत के पिता सागर जी, विद्या के माता-पिता से कहते हैं "अच्छा तो फिर हमें चलने की इजाज़त दीजिये । आप विद्या से पूँछना कि वो क्या चाहती है । आप हमें फिर जवाब दे दीजिएगा ।" उसके बाद सिद्धांत और उसके माता-पिता वहाँ से चले आते हैं ।

सिद्धांत और सिद्धांत के माता-पिता के चले जाने के बाद विद्या के माता-पिता विद्या से कहते है "हमें तो लड़का बहुत पसंद है । सभ्य है, सुन्दर है, सुधील है, कामयाब है । कॉलेज में प्रोफ़ेसर है । उसके माता-पिता भी बहुत अच्छे हैं । ऐसा ही रिश्ता तो हमें चाहिए था । क्या कहती हो विद्या ? तुम्हें सिद्धांत कैसा लगा ?" विद्या जो अपने माता-पिता की बात सुन रही थी और कुछ सोच रही थी, कहती है " सिद्धांत ने क्या कहा ? क्या वो शादी के लिये तैयार है ?"
विद्या की माँ कहती हैं "बहुत खुशनसीब होती हैं वो लडकियां जिन्हें ऐसा पति मिलता है जो अपने से पहले अपनी पत्नी की इच्छा का ख़याल रखता है । उसने यही कहा कि अगर विद्या को कोई ऐतराज़ नही तो मुझे भी कोई ऐतराज़ नही ।" विद्या अपनी माँ की बात सुनकर कुछ खामोश सी हो जाती है और कहती है "मुझे कुछ वक़्त दीजिये सोचने के लिये । मैं एक-दो दिन में जवाब देती हूँ ।"

अगली शाम विद्या अपनी माँ से कहती है "माँ क्या में सिद्धांत से एक बार और बात कर सकती हूँ ?" विद्या की माँ कहती है "क्यों अब क्या बात करना चाहती है ? उस दिन क्या बात नही कि थी ? या उस दिन कुछ अधूरा रह गया था ।" विद्या अपनी माँ के हाथों को पकड़ कहती है "माँ, आखिर जिंदगी भर की बात है । इतना हक़ तो बनता है । कुछ निर्णय बहुत मुश्किल होते हैं । उन्हें लेना तो और भी ज्यादा मुश्किल होता है । मैं एक बार और सिद्धांत से बात करना चाहती हूँ ।" विद्या की माँ कहती है "ठीक है, अगर तेरी यही मर्ज़ी है तो मैं सिद्धांत की माँ से बात करती हूँ ।"

विद्या की माँ सिद्धांत की माँ से सारी बात कर लेती हैं और उसके बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि विद्या और सिद्धांत अगले रोज़ बाहर किसी रेस्टोरेंट में मिल लेंगे और जो बात करना चाहते हैं वो कर लेंगे।

सिद्धांत आज रेस्टोरेंट में बैठा हुआ विद्या का इंतज़ार कर रहा था तभी उसकी आँखों के सामने वो शाम आकर खड़ी हो गयी जब उसने विद्या से अपने दिल का हाल कहना चाहा था । जिस शाम के बाद की सारी रात उसने इंतज़ार करते करते वहीँ उस रेस्टोरेंट के सामने गुजार दी थी । अजीब इत्तेफाक है उस शाम का ज़िक्र भी ये आँखें अचानक आज यूँ इस तरह क्यों कर रही हैं । जो बहुत पहले कहीं पीछे छूट गया वो आज यूँ इस तरह सामने क्यों आ रहा है ? इसी सोच में डूबा सिद्धांत बैठा था कि तभी वहाँ विद्या पहुँच गयी । सिद्धांत की नज़र आती हुई विद्या पर पड़ती है ।
वही विद्या जिसके सामने पड जाने पर उसके दिल कि धड़कन तेज हो जाती थी, कलम अल्फाज़ लिखने को बेताब रहती थी । जिसको देख भर लेने से सिद्धांत को अपार ख़ुशी मिलती थी ।

विद्या सिद्धांत के पास पहुँच जाती है, सिद्धांत खड़ा होकर उसका स्वागत करता है और उसे बैठने के लिये कुर्सी देता है । अचानक से उनके बीच एक ख़ामोशी आ जाती है । तब न तो विद्या के पास कोई लफ्ज़ होते और ना ही सिद्धांत के पास पूँछने के लिये कुछ । तभी वेटर आकर उनकी ख़ामोशी तोड़ता है और कहता है "क्या लाना है सर ?" सिद्धांत उसकी ओर देखता है फिर विद्या की ओर और कहता है "मैं तो एक कॉफी लूँगा और तुम विद्या क्या लोगी ?"
विद्या ख़ामोशी तोड़ते हुए कहती है "ह्म्म्म, मैं भी कॉफी लूँगी ।"

वेटर के चले जाने पर सिद्धांत कहता है "माँ कह रही थी कि तुम मुझसे मिल कर और बात करना चाहती हो । पूँछो क्या पूँछना चाहती हो ? " विद्या सिद्धांत को एक नज़र देखती है और फिर कुछ सोचती है और कुछ कहना चाहती है तभी वेटर वहाँ आकर कॉफी रख जाता है । सिद्धांत कॉफी को विद्या की ओर बढाता है और अपनी कॉफी को होठों तक ले जाता है ।

विद्या, सिद्धांत को कॉफी पीते हुए देखती है फिर कहती है "सिद्धांत आप मुझसे शादी क्यों करना चाहते हैं ? मैं तो सोच रही थी कि आप मना कर देंगे ।" सिद्धांत कॉफी के कप को नीचे रखते हुए कहता है " क्योंकि मेरे पास मना करने का कोई कारण नही । मैं अगर किसी भी लड़की से शादी करूँगा तो क्या देखूँगा । कि वो सुन्दर है, पढ़ी लिखी है , उसके माता-पिता कैसे हैं ? अगर यह सब मुझे किसी भी लड़की में दिखता है तो मैं उससे शादी कर लूँगा अगर वो भी मुझसे शादी करना चाहती है तो ।"

विद्या बहुत ध्यान से सिद्धांत को सुन रही थी और फिर कहती है "आप मेरे बारे में जानते हुए भी शादी करना चाहते हो ?" सिद्धांत कहता है "क्या ? यही जानते हुए कि तुम्हारे पहले से प्रेम सम्बन्ध रहे हैं ।" विद्या, सिद्धांत को देखती है और हाँ में सिर हिलाती है फिर कॉफी की तरफ देखने लगती है ।" सिद्धांत कहता है "हाँ मुझे किसी की बीती हुई जिंदगी से कोई फर्क नही पड़ता । अब मान के चलो कि मैं तुमसे शादी न करके किसी और लड़की को देखकर शादी कर लेता हूँ और वो मुझे अपने अतीत के बारे में कुछ नही बताती, तो उससे ना ही तो मुझे फर्क पड़ता और ना ही उसमें मैं कुछ कर पाउँगा । इसी लिये मैं आज में जीते हुए निर्णय करता हूँ । अगर तुम मुझसे शादी करना चाहोगी तो मैं किसी भी अन्य लड़की की तरह तुमसे शादी करना चाहूँगा । वैसे भी तुम मेरे माता-पिता को कुछ ज्यादा ही पसंद हो ।"

विद्या कहती है "मगर मैं चाहती हूँ कि मैं पहले से ही सबकुछ बता कर रखूँ ताकि बाद में कोई समस्या ना आये ।"
सिद्धांत कहता है "मैंने कहा ना कि अगर अतीत बीत चुका है और तुम्हारा उस अतीत से अब अगर कोई सम्बन्ध नही तो मुझे कोई फर्क नही पड़ता ।" विद्या, सिद्धांत की आँखों में एक पल के लिये देखती है और फिर किसी सोच में चली जाती है । सिद्धांत चुटकी बजा कर कहता है "विद्या कॉफी ठन्डी हो गयी ।" विद्या पुनः अपने आप को उस रेस्टोरेंट में पाती है ।

विद्या कहती है "अब मैं चलूँ । वैसे भी अब काफी समय हो गया है ।" सिद्धांत मुस्कुराते हुए खड़ा हो जाता है । विद्या फिर वहाँ से चली जाती है । सिद्धांत अपनी आँखों से ओझल हो जाने तक उसे देखता ही रहता है ।

अगले रोज़ सिद्धांत की माँ को फ़ोन करके विद्या की माँ कहती हैं कि "समधिन जी, तो बताइए कब करनी है शादी ?"
सिद्धांत की माँ खुश होकर कहती हैं "तो क्या विद्या ने जवाब दे दिया ?" विद्या की माँ कहती हैं "हाँ, उसी की इच्छा जानने के बाद मैंने आपको फ़ोन किया है ।"

सिद्धांत की माँ कहती हैं "ठीक है, मैं आज ही पंडित जी से शादी की तारीख निकलवाती हूँ और आप भी पंडित जी को दिखा लीजियेगा" विद्या की माँ कहती है "ठीक है बहन जी, जो भी जल्द से जल्द तारीख निकले उसमें चट मंगनी और पट ब्याह कर दते हैं, नही तो ना जाने कब इन बच्चों का दिमाग बदल जाए" और फिर दोनों हँसने लगती हैं ।

शाम को सिद्धांत के घर आने पर, सिद्धांत की माँ उसे बताती हैं कि वहाँ से जवाब आ गया है । सिद्धांत पूँछता है "क्या ?" वो बोलती हैं "और क्या आएगा, मुझे तो पहले से ही पता था । अब तो जल्द से जल्द तारीख निकलवानी पड़ेगी और एक लड्डू लाकर सिद्धांत के मुँह में रख देती हैं ।" ये बात सुनकर सिद्धांत की आँखों के सामने पुनः पुराने दिन आकर खड़े हो जाते हैं । पुरानी चाहत, पुराने दिन । सब कुछ आकर उसके दामन को थामने की कोशिश करने लगते हैं । सिद्धांत एक गहरी साँस लेता है । ढलते हुए सूरज को देखता है और अपने कमरे में चला जाता है ।


अपने कमरे मैं बैठा किसी सोच में डूबा था कि तभी कुछ सफ़हे नाचते से दिखते हैं । ये हवा का असर था या इतने बरस बाद उन अल्फाजों के दर्द को मिली राहत का असर । जो भी था लेकिन एक सुखद एहसास था । सिद्धांत उन सफहों को छूकर देखता है, अचानक से वो तस्वीर सामने आ जाती है जिसे हॉस्टल के दिनों में देखकर सिद्धांत खुश हो जाया करता था । आज फिर से सब कुछ सामने था । सिद्धांत तस्वीर को उठाकर देखता है, मुस्कुराता है और पुनः उसे डायरी में रखकर, डायरी को बंद कर देता है ।

कल का सूरज अपनी रौशनी के साथ कुछ गुनगुनी धूप लाने जा रहा था और बीच की ये रात तमाम खूबसूरत ख्वाब बुनने के लिये बाहें पसारे खड़ी थी... अंतिम भाग पढने के लिये यहाँ ज़िक्र(एक प्रेम कहानी)-अंतिम भाग पर क्लिक करें

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ज़िक्र (एक प्रेम कहानी)

कुछ रातें ऐसी होती हैं जो जिंदगी में अपना असर छोड़ जाती हैं । वो रात भले ही बीत जाए लेकिन उसके बाद उम्र भर कुछ अनकहे धुंधले-से अक्स स्मृतियों में उलझे रह जाते हैं । जो पानी के दाग की तरह वजूद के लिबास पर हमेशा के लिए नक्श हो जाते हैं ।

ऐसी ही उस रात जब सिद्धांत 2 बजे अपनी डायरी के चंद सफहों को देखता और उनके अल्फाजों पर अपनी उंगलियाँ रखता तो उसकी आँखें डबडबा जाती । एक एक अल्फाज़ उसने इन पिछले बरसों में दिल से लिखा था । आज भी जैसे हर अलफ़ाज़ अपनी एक अलग ही कहानी कहना चाहता है । फिर उस तस्वीर को निकालता है, बस यूँ ही उसे एकटक देखता है, अपनी भर आयीं आँखों के आँसू पौंछता है । तभी उसका दोस्त साकेत उसके कंधे पर पीछे से हाथ रखता है । "उसको बता क्यों नहीं देता कि तू उसे कितना चाहता है" कहते हुए साकेत उसके सामने आता है । सिद्धांत हँसते हुए फोटो को देखता है और कहता है कि "ऊपर वाला दिल क्यों देता है इंसान को ? न ये कमबख्त दिल होता और ना ही इस दिल की ये तमाम मुश्किलें होतीं ।"

साकेत कहता है " ताकि उसके दिये हुए दिल की वजह से इस धरती पर इंसानियत कायम रहे और तुझ जैसा दिल भी ना जाने उसने किस फुर्सत में बनाया होगा । जो हर रोज़ दर्द सहता है और उफ़ तक नहीं करता । उससे अपनी मोहब्बत का इज़हार क्यों नहीं कर देता । क्यों नहीं बता देता उसे कि तेरी रूह तक में उतर गयी है वो । अरे कोई जाने ना जाने पर मुझे एहसास है कि तेरे लिखे हुए वो अल्फाज़ भी दर्द से रो पड़ते होंगे । मैंने छूकर देखा है उन अल्फाजों को, बहुत आँसू बहाते हैं वो, जैसे कि अभी अपने दर्द की कहानी मुझसे कहना चाहते हों । अरे तूने उन सभी अल्फाजों को जमा कर रखा है । उन्हें आज़ाद क्यों नहीं कर देता ? कह क्यों नहीं देता उससे कि तू उसे कितना चाहता है । "

सिद्धांत डायरी में फोटो रखकर डायरी को बंद करते हुए गहरी साँस लेता है और कहता है " काश कि मैं जता सकता उसे कि मैं उसे कितना चाहता हूँ । मगर अफ़सोस ये मुमकिन नहीं । तू तो जानता है कि वो किसी और को चाहती है । " साकेत सिद्धांत की आँखों में देखते हुए कहता है " देख सिद्धांत मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि अगर तूने अपने दिल की बात उसे नहीं बतायी तो तू जिंदगी भर यूँ ही अन्दर ही अन्दर तड़पता रहेगा । कुछ एहसासों को शब्द देना बहुत जरूरी हो जाता है मेरे यार । नहीं तो वो ताउम्र वजूद के लिबास पर हमेशा चिपके रहते हैं । न तो जीने देते और न ही मरने देते । मोहब्बत को पा लेना ही मोहब्बत नहीं कहलाती । अरे जिसको तुमने चाहा अगर उसे उस चाहत, उस मोहब्बत का एहसास करा दिया, उसे अपने दिल का हाल बयाँ कर दिया तो उससे दिल को जो सुकूँ हासिल होगा, उससे बढ़कर कोई सुकूँ नहीं । मेरे दोस्त इन चन्द बचे हुए दिनों में तू अपने दिल का हाल बयाँ कर दे और सारी जिंदगी का सुकूँ हासिल कर ।"

सिद्धांत साकेत की बातें सुन अपनी आँखें बंद कर कुर्सी पर बैठा बैठा कुछ सोचने लगता है । साकेत, सिद्धांत का हाथ पकड़ अपने सर पर रखकर कहता है "तुझे मेरी कसम है कि तू इन चन्द बचे हुए दिनों में उसे अपने दिल का हाल बता देगा ।" सिद्धांत एक पल साकेत को देखता रहता है और कहता है "हाँ मैं कहूँगा ।"

अगले रोज़ कॉलेज के पुस्तकालय में किताबों की कतारों के दरमियाँ विद्या को पाकर सिद्धांत उसके पास जाकर पीछे से कहता है "विद्या मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूँ ।" विद्या, सिद्धांत की ओर मुड़कर कहती है "हाँ, कहो, क्या बात है ?"

"न-न यहाँ नहीं, यहाँ मुनासिब नहीं, क्या तू शाम को 6 बजे शहर के मंदिर के पास वाले रेस्टोरेंट पर मिल सकती हो ।" कहते हुए सिद्धांत विद्या के चेहरे को देखता है । विद्या, सिद्धांत से कहती है "ठीक है, मैं आ जाऊँगी और अगर ना आ सकी तो मैं फ़ोन कर दूंगी ।" सिद्धांत कहता है "पक्का ?"
"हाँ बाबा पक्का" कहती हुई विद्या चली जाती है ।

वो इंजीनियरिंग कॉलेज में सिद्धांत की विद्या से की हुई आखिरी बात थी । उस शाम न तो विद्या आयी और न ही उसका कोई फ़ोन आया । सिद्धांत इंतज़ार करता ही रहा, करता ही रहा । वो तो ना जाने कब तक इंतज़ार करता रहता । जब सुबह तक सिद्धांत हॉस्टल नहीं लौटा तो साकेत उसे वहाँ से जाकर ले आया । "पागल हो गया है क्या, सारी रात यहाँ रेस्टोरेंट के बाहर गुजार दी । अरे नहीं आयी तो नहीं आयी । अब ख़त्म कर ये किस्सा । गलती मेरी ही थी जो मैंने तुझे कसम दी ।" कहता हुआ साकेत हॉस्टल के उस कमरे में बैठा हुआ खुद को दोषी पा रहा था ।

उस रात ने ऐसा असर छोड़ा कि हमेशा जहन में बैठ गयी । अगले 5 साल तक उसका असर रहा । लेकिन कुछ किस्से आसानी से ख़त्म नहीं होते । शायद उन्हें अपना बाकी का हिस्सा जीना होता है । शायद उन्हें टुकड़ों में जिंदा रखकर ऊपर वाला कोई बात कहना चाहता है । ऐसा ही हुआ जब 5 साल बाद एक रोज़....
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ख़्वाहिशों की शाम ढलती है !!

>> 17 December 2009

अजीब दिन थे । बाहों में बाहें डाले चहलकदमी करते रहने के दिन । उतरते हुए सूरज और ढलती हुई शामों के दिन । दूजे के हाथों प्रेम संदेशा पहुँचाने के दिन । गली के नुक्कड़ पर उसका इतंजार करते रहने के दिन । किताबों के आखिरी सफहों पर मन में पिघल रहे कुछ शब्दों को लिख देने के दिन ।

ऐसे ही उन दिनों में कस्बाई सपने, जो सुबह सूरज के साथ उगते थे और ढलती हुई शामों के साथ छतों से कपड़ों की तरह उतार लिये जाते थे । कई आँखें थी आस पास जो मिल जाने पर शरमा कर झुक जाया करती थीं। कई आँखों में दबे-छुपे से प्रणय निवेदन तो कई आँखें जो भुलायी नहीं जा सकती । शराफत के दिन, नजाकत के दिन, मोहब्बत के दिन, आरजुओं के दिन ।

वो उसे बस यूँ ही एक रोज़ अपनी छुट्टियों के होने पर वापसी में घर जाते हुए उसी स्टेशन पर मिल गयी । तब ना यूँ किसी को 'फ्लर्ट' करने के तरीके आते थे और ना ही कोई किसी को 'इम्प्रेस' करने की कोशिश किया करता था । बहुत सादगी हुआ करती थी । एक दूजे के आमने सामने बैठे हुए भी कई घंटे बिना बात किये हुए बीत जाते थे और जो नज़रें मिल जाएँ तो अन्दर ही अन्दर अजीब सी हलचल सी मच जाया करती थी ।

अपर्णा, हाँ यही तो नाम बताया था उसने जब वो सिद्धार्थ को दूसरी बार फिर यूँ ही उसी रास्ते घर को जाने के लिये स्टेशन पर मिली थी । फिर हर बार ही उनमें कुछ ऐसी अनकही बातें सी हो गयीं थीं कि छुट्टियां होने पर वो स्टेशन पर एक दूजे का इंतज़ार किया करते और जब तक दूसरा ना आ जाता तब तक पहला ना जाता । बड़े सुहाने दिन थे, तब शायद वो रेलगाड़ियाँ भी दोस्त हुआ करती थीं । जो दोनों के साथ हो जाने तक वहीँ खड़ी रहती थीं।

अपर्णा को सिद्धार्थ से दो स्टेशन पहले ही उतरना होता था । तब आज की तरह उन कस्बाई रूहों में बाय बाय या टाटा-टाटा कहने का रिवाज नहीं हुआ करता था । बस सिद्धार्थ उसका सामान उसे उसके रेलगाड़ी से नीचे उतर जाने पर पकड़ा दिया करता था और अपर्णा "अच्छा" कहती हुई चली जाया करती थी ।

जब साथ हुआ करते तो उन्हें सब पता रहता था कि अब कौन सा स्टेशन आएगा या किस स्टेशन पर कौन सी खाने की चीज़ अच्छी मिलती है । दूसरे के बोलने से पहले ही कोई बोल पड़ता कि चलो ये खायें या फिर कभी कभी दोनों एक साथ ही बोल पड़ते, ये भी एक अजीब बात थी कि दोनों की जुबान से एक से ही लफ्ज़ निकलते थे ।

साथ वापस आते और फिर साथ ही दोबारा कॉलेज जाते हुए उस दूर बसे दूसरे शहर के लिये दिल में कुछ पैदा हो गया था । शायद ऐसा कुछ कि क्या ये नहीं हो सकता कि ये जिंदगी ऐसे ही सफ़र करते हुए कट जाए । कहने को तो ना ही अपर्णा ने कुछ कहा था और ना ही सिद्धार्थ ने कभी कुछ पूंछना चाहा ।

उन्हीं दिनों में जब "आई लव यू" कहने का रिवाज़ ना था । ना ही कोई अपने प्रेम का इजहार यूँ खुले रूप में करता था । मौन स्वीकृतियां ही प्रेम कहानी बन जाया करती थी । तब तो बस वही भोले भाले से प्रेम पत्र हुआ करते थे जो कि चाहने वालों के दिलों से निकली हुई आवाजें दूजे के दिल तक पहुँचाया करते थे ।

वो चेहरे के भाव, वो आँखें, वो ख़ामोशी और फिर रह रहकर कुछ बात कर लेने की आदत । सब कुछ तो याद हो गया था सिद्धार्थ को । एक दूजे की कई आदतें पता चल चुकी थीं, उन किये हुए सफरों के दौरान । दोनों ओर से मौन रहते हुए भी, कुछ भी ऐसा नहीं था कि जो कहने को बाकी था ।

तब उस रोज़ वो अकेली नहीं थी । एक बुजुर्ग चेहरा भी उस चेहरे के साथ था । साफ़ था, कि वो जाहिरी तौर पर उसके पिताजी ही थे । उस रोज़ रेलगाड़ी भी वही थी और सफ़र करने वाले भी वही, मगर आँखों में ख़ुशी नहीं थी । सवाल तो कभी उन आँखों ने पूंछे ही न थे । तब उस रोज़ की ख़ामोशी ने सब कुछ पहले ही बयाँ कर दिया था । ऐसी गहरी ख़ामोशी तो कभी न रही थी उस चेहरे पर जो कि सीधे दिल में उतर जाए और छा जाए एक खामोश पल बनकर ।

जब रेलगाड़ी से उतरते हुए उसने वो किताब उस बुजुर्ग चेहरे के सामने ही सिद्धार्थ को वापस की थी । तो बहुत कुछ तो बिना जाने ही उस दिल को आभास हो चला था ।

किताब का आखिरी सफ़हा जो कि अब अपर्णा की जुबाँ थी और जो कह रही थी । अब अगले बरस मैं नहीं आ सकूँगी, आगे की पढाई शायद अब मैं ना कर सकूँ । पिताजी अब यही चाहते हैं ।

उस आखिरी सफ़हे का साफ़ कहना था कि अब अपर्णा कभी फिर इस सफ़र पर नहीं आएगी और आगे की पढाई ना करने का मतलब था कि उसके पिताजी ने उसका रिश्ता कहीं तय कर दिया है । उस रोज़ वो अपर्णा का आखिरी सफ़र था जिसमें कब कौन सा स्टेशन गुज़र गया, ना ही तो अपर्णा ने जानना चाहा था और ना ही सिद्धार्थ ने ।

ट्रेन से उतर जब वो उस पुल पर पहुँची थी तब उसने पलट कर एक बार देखा था और जाते हुए अपना रुमाल गिराया था । सिद्धार्थ तब चाहते हुए भी वहाँ पहुँच वो रुमाल नहीं उठा सका था । रेलगाड़ी में उसका सामान रखा हुआ था । किताबें, पेन, कपड़े और वो आखिरी किताब भी जिसके आखिरी सफ़हे पर अपर्णा के लिखे हुए आखिरी लफ्ज़ थे । रेलगाड़ी चल दी थी और तब सिद्धार्थ के पास इतना वक़्त ना था कि वो दौड़कर जाकर उस रुमाल को उठा ले । उसकी आखिरी निशानी भी तो ना ले सका था सिद्धार्थ ।

इतने बरस बीत गये । पता नहीं कहाँ होगी अपर्णा । उस आखिरी रोज़ के आखिरी सफ़र में वो निशानी भी जाती रही ।





नोट : कहानी का विचार 'कितने पाकिस्तान' उपन्यास के चंद सफहों से लिया गया है ।

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झूठा सच बनाम समाजशास्त्र

>> 10 December 2009

मास्टर जी कक्षा में ब्लैक बोर्ड के सामने हाथ में डंडा पकड़े हुए किसी चुनाव में दिए जाने वाले भाषण के समय मंत्री की तरह दहाड़ रहे हैं और ख़ुद को शेर से कम नहीं समझते हुए पूँछ रहे है कि बताओ "कि सतहत्तर, अठहत्तर और उनहत्तर में से कौन सी संख्या बड़ी है ।" सब बच्चों को ऐसे सांप सूंघ गया जैसे कि जिला अधिकारी की बैठक में भाग लेने वाले नीचे के अधिकारी और बाबुओं को सूंघ जाता है.

मास्टर जी फिर से दहाड़ते हैं कि "क्यों खाने के वक्त तो ये मुंह बड़ी जल्दी खुल जाता है ? सबेरे सबेरे आ जाते हो अपनी अपनी नाँद भर भर के और अब देखो तो किसी का मुँह नहीं खुल रहा है ।" कक्षा में उपस्थित ज्यादातर बच्चे उंघाह रहे हैं, कुछ जम्हाई ले रहे हैं, जैसे कि किसी मंत्री के लंबे दिए जाने वाले भाषण में किए हुए वादों के वक्त उनके सहयोगी साथीगण ये सोच जम्हाई लेते रहते हैं कि कर दो भाई जितने वादे करने हैं, कौन सा पूरा करना है ? जो मन में आए बस बक दो फटाफट.

मास्टर जी एक बच्चे को खड़ा कर लेते हैं, इशारा करते हुए बोलते हैं "हाँ भाई तुम" उसके अगल बगल वाले बच्चे ख़ुद की तरफ़ देखते हैं फिर मास्टर जी की तरफ़ और ये सोच डरते हैं कि कहीं हमें खड़ा तो नहीं कर रहे । हाँ तुमसे ही कहा रहा हूँ " क्या नाम है तुम्हारा श्याम ?" वो लड़का खड़ा हो जाता है और बोलता है "नहीं मास्साब, रामभरोसे" सुनकर मास्टर जी बोलते हैं "अब जब तुम्हारा नाम ही रामभरोसे है तो तुम्हें क्या ख़ाक पता होगा, पर उस दिन तो तुमने अपना नाम श्याम बताया था" लड़का खड़ा खड़ा कहता है "नहीं मास्साब, मेरा नाम रामभरोसे ही है ।" मास्टर जी उसे घूरते हुए कहते हैं "अच्छा अच्छा, ठीक है-ठीक है । क्या नाम है तुम्हारे पिताजी का ?" लड़का बोलता है "जी रामलाल" मास्टर जी बोलते हैं "तुम रामभरोसे और वो रामलाल, बड़ा प्यार है राम से, तुम्हारी अम्मा का क्या नाम है ?" लड़का बोलता है "जी रामदुलारी और बाबा का रामदीन, चाचा का रामसनेही, रामकिशोर, रामदयाल, राम पाल" मास्टर जी चिढ़ते हुए बोलते हैं "रुक क्यों गया और कोई रह गया तो उसका भी बता दे" तो वो शुरू हो जाता है "रामकटोरी हमारी दादी, रामबिटिया, रामवती हमारी बहने" तब तक मास्टर जी चिल्लाते हैं "अब चुप बैठेगा कि दूँ एक खींच के, पूरा का पूरा घर राम से जुड़ा हुआ लगता है, जरूर ये उस शास्त्री का किया धारा होगा उसी के खानदान ने तुम लोगों के ये नाम धरे होंगे"

मास्टर जी फिर से एक बच्चे की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं "हाँ तुम बताओ, कौन सी संख्या बड़ी है ?" लड़का खड़ा खड़ा सिर खुजलाने लगता है, कभी ऊपर देखता है और फिर कभी नीचे। तब तक मास्टर जी कहते हैं "ऊपर क्या तुम्हारे दद्दा लिख कर छोड़ गए हैं कि कौन बड़ा है, आ जाते हैं बिना मुँह धोये पढने, रात का बचा हुआ जो भी होता है भर आते हो तेंटुये (गले) तक और यहाँ आकर सोते रहते हो दिन भर" कुछ देर में मास्टर जी के हाथों 4-6 बच्चे ठुक चुके होते हैं फिर मास्टर जी दहाड़ते हुए ऐसे बताते हैं कि ये सिर्फ़ उन्हें ही पता था कि "अठहत्तर बड़ी है गधों"

थोड़ी देर बाद मास्टर जी दूसरी कक्षा में पहुँच कहते हैं कि "दहेज़ प्रथा के ऊपर जो निबंध लिख कर लाने को कहा था वो सब अपनी अपनी कापियाँ दिखाओ" सब बच्चे अपनी अपनी कापियाँ जमा कर देते हैं । मास्टर जी यूँ ही कोई भी काँपी उठा कर देखने लग जाते हैं, थोड़ी देर पढ़ते हैं और फिर कहते हैं "किसकी है ये काँपी ?" नाम पढ़ते हैं और चिल्लाते हैं कि "खड़े हो जाओ", लड़का खड़ा हो जाता है । मास्टर जी कहते हैं "ये क्या लिख रहे हो तुम, कुछ भी अंट शंट, दहेज़ प्रथा बहुत जनम जनम पुरानी प्रथा है, मेरे बापू मुझे रोज़ उलाहना देते हैं कि तू जितना चाहे मौज उड़ा ले . तेरे ब्याह के बखत तेरे दहेज़ में सब वसूल लूँगा । रामदीन के लड़के को बहुत अच्छा दहेज़ मिला है । वो रोज़ अपनी फटफटिया पर बाजार जाता है । जिस किसी की शादी में जितना दहेज़ आता है उसके लगन में उतनी ही अधिक बन्दूक से गोलियां चलती हैं, पिछले साल ही रामधन के लड़के के लगन के बखत गोली चल जाने से छत पर खड़ा बिर्जुआ ढेर हो गया था । जब लगन के बखत दहेज़ न मिले तो फेरे के बखत नाटक करने से बचा हुआ दहेज़ मिल जाता है । पर रामकिशोर के लड़के की शादी के बखत पूरी बारात को बाँध के डाल लिया था, जैसे तैसे उन्होंने छोड़ा और शादी भी नहीं की । वो तो नाक कट रही थी इस कारण उसी गाँव की कोई दूसरी लड़की से चट मंगनी और पट ब्याह कर डाले। हम भी सोचत हैं कि जल्दी से हमारा भी लगन हो जाए तो हम भी फटफटिया घुमाए पूरे गाँव में । " मास्टर जी उस लड़के के मुँह पर काँपी फैंक कर मारते हैं और उसे पास बुलाकर 8-10 खींच खींच के रसीद करते हैं, थोड़ी देर में वो रोता, भुनभुनाता, चुपचाप होकर अपनी जगह बैठ जाता है ।

मास्टर जी दूसरी काँपी उठाते हैं, थोड़ी देर पढ़ते हैं और फिर नाम पुकार कर खड़ा करते हैं । उसकी शक्ल की तरफ़ देखते हैं और कहते हैं "तुम वही रामदीन दूधवाले के लड़के हो ।" वो मुँह फाड़ कर खुश होते हुए बोलता है "हाँ उन्हीं का हूँ ।" मास्टर जी कहते हैं "कि तुमने ये क्या बकवास लिखा है । दहेज़ प्रथा हमारी संस्कृति है । इस प्रथा की वजह से हमारा पूरे संसार में बहुत नाम है । दहेज़ लेकर रामलखन, रामपाल, रामसुंदर, रामनिवास सबके सब गुलछर्रे उड़ा रहे हैं । उन्हें दहेज़ में बहुत मोटी रकम मिली तो अब वो जी खोल के ताश पत्ता खेलते हैं, पिच्चर देखते हैं, फटफटिया घुमाते हैं और बीडी पीकर मस्त रहते हैं । बापू कहते हैं कि दहेज़ तो लेना पड़ता है, नहीं तो समाज में हमारी नाक न कट जायेगी, कि देखो तो रामसिंह के लड़के को फूटी कौड़ी नहीं मिली, पूरा नाम मिटटी में मिल जाएगा और फिर पूरी जिंदगी तुझे अपनी उस लुगाई को बैठालकर खिलाना भी तो पड़ेगा । तो दहेज़ तो लेना ही पड़ता है बेटा । बापू सोचते हैं कि मेरे लगन में फटफटिया तो मिलेगी ही मिलेगी और 4-6 भैंस भी मिल ही जायेंगी । मैं भी सोच रहा हूँ कि जल्द से जल्द लगन हो तो फटफटिया लेकर खूब मौज उड़ायें और उन भैंसों का दूध बेचने बाजार जाएँ।" मास्टर जी गुस्से में आकर उस लड़के के पास पहुँच कर उसकी डंडे से सुताई कर देते हैं।

मास्टर जी फिर उन्हें समझाते हैं कि दहेज़ लेना बहुत बुरी बात है और ये हमारे समाज पर एक कलंक है । यह हमारे समाज को अन्दर ही अन्दर खोखला कर रहा है । इसी दौरान गाँव के रामसुख चाचा आ जाते हैं और वो मास्टर जी को इशारा करके बाहर बुलाते हैं । मास्टर जी बाहर जाते हैं तो रामसुख चाचा कहते हैं "कि पल्ले गाँव के कृष्णचंद जी आए है अपनी लड़की का रिश्ता आपके लड़के के लिए लेकर ।" मास्टर जी कहते हैं कि "वो तो पहले भी आ चुके हैं, मैंने उन्हें पहले ही इशारों ही इशारों में बता दिया था कि उतने कम पैसे में मैं अपने लड़के का लगन नहीं करूँगा, आख़िर हमारी भी कोई इज्ज़त है ।" रामसुख चाचा कहते हैं "अरे मैं इस बार उन्हें सब समझा लाया हूँ, वो सब मान गए हैं और जितना तुम चाहते हो उतना दहेज़ दे देंगे, बाकी चिंता काहे करते हो, हम हैं ना । " मास्टर जी मुस्कुरा जाते हैं ।

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नंदनी महाजन जी का हिन्दी ब्लॉग जगत को अलविदा कहना हिन्दी ब्लॉग जगत के हित में नहीं

>> 09 December 2009

मैं यह पोस्ट ना ही तो ज्यादा ट्रैफिक पाने के लिए लिख रहा हूँ और ना ही ज्यादा टिप्पणियों की खातिर।

आज जब मैंने नंदनी महाजन जी का ब्लॉग जख्म परेशां है चुप्पी से...देखा तो मुझे बहुत दुःख हुआ यह जानकर कि नंदनी महाजन जी ने हिन्दी ब्लॉग जगत को अलविदा कहते हुए अपना ब्लॉग बंद करने का निर्णय लिया।

मैं यहाँ किसी बात की व्याख्या नहीं करूँगा कि किसकी गलती थी, ये सब क्यों हुआ ? ना ही इन सब बातों में मुझे ज्यादा दिलचस्पी रहती है। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि हिन्दी ब्लॉग जगत में वैसे ही चन्द लोग अच्छा लिखने वाले हैं और अगर वो भी धीरे धीरे छोड़कर जाने लगे तो ये हिन्दी चिट्ठाकारी के भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। यदि मैं हिन्दी चिट्ठा जगत को एक हार मानूं तो यकीनन नंदनी महाजन जी जैसे व्यक्ति उसका एक मोती जरूर हैं।

मैं उनसे आग्रह करता हूँ कि वो अपने लेखन को सुचारू रूप से जारी रखें, भले ही वो टिपण्णी का विकल्प अपने ब्लॉग से हटा दें। मैं चाहता हूँ कि नंदनी जी आप लिखें, मैं और मेरे जैसे लोग आपका लिखा पढ़ना चाहते हैं ।
चूँकि न ही तो आपके ब्लॉग के अब एकमात्र पन्ने पर कोई मेल-आईडी है और ना ही कोई टिपण्णी करने का विकल्प तो मैं ऐसे में चाहूँगा कि यदि कोई उन्हें जानता है, चाहे किसी भी तौर पर, तो उनको मेरा यह आग्रह पहुँचा दें।

यदि नंदनी जी आप मुझे पढ़ती हों या पढ़ें तो मैं आपसे यही कहना चाहूँगा कि आप आगे निरंतर लिखती रहें ।


आपका प्रशंसक एवं ब्लॉग परिवार का सदस्य
अनिल कान्त

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कोई दम में आतिशफ़िशाँ फटेगा कभी ?

>> 07 December 2009

कभी कभी मन करता है कि कई दिनों तक और कई रातों तक सोता रहूँ । इतना कि इस सोते रहने की सोच से निजात मिले । हर गम और हर परेशानी उस सोते हुए दिन रात में घुल जाए, चाहे कितने भी बुरे से बुरे स्वप्न आयें और मैं उन्हें देखूं, ख़ुद को मरते हुए, जीते हुए, तडपते हुए, सहमते हुए, सकुचाते हुए, लड़खड़ाते हुए, घबराते हुए । जब मैं उठूँ तो वह फिर से रह रहकर मुझे याद न आए ।

मन करता है कि किसी पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ कर वहाँ खड़ा हो जाऊँ और ज़ोर ज़ोर से चिल्ला चिल्ला कर अपना गला फाड़ लूँ । उस चिल्लाहट में मैं अपना वो सब गुस्सा, आक्रोश निकाल देना चाहता हूँ जो इतने सालों से मेरे अन्दर भरा हुआ है । जो लावा की तरह मेरी रगों में बह रहा है । मैं चाहता हूँ कि दूसरी पहाड़ों की चोटियाँ भी मेरे वह दर्द भरे, रोते हुए, चिल्लाते हुए स्वर सुनें और मुझे वापस करें । मैं चाहता हूँ उन्हें सुनना कि कैसे लगती है वो घुटन, वो आक्रोश, वो तड़प सुनने में, जो भरी है कई बरसों से मेरे अन्दर।

चाहता हूँ कि दौड़ता रहूँ-दौड़ता रहूँ और जब तक दौड़ता रहूँ जब तक कि मेरे कदम थक कर चूर नहीं हो जाते । चाहता हूँ कि साँसों के हाँफने की आवाज़ सुनूँ । मैं उसमें भी वो बसी हुई सहमी सी, दबी हुई सी बातें सुनना चाहता हूँ, जो मैंने कभी किसी कारण तो कभी किसी कारण न कह पायी ।

मैं जी भर के रोना चाहता हूँ, कई बरसों का जमा किया हुआ रोना । जो मैंने अपने बड़क्क्पन में, ये जताते हुए नही रोया कि मैं कमजोर नहीं हूँ, कि मैं बड़ा हूँ सबसे तो मैं कैसे रो सकता हूँ, कि मेरा रोना इन सबसे सहन नहीं होगा । पर मैं रोना चाहता हूँ बेतहाशा, इतना कि जो कभी फिर से रोने का मन ना करे ।

हाँ माँ मैं थक कर चूर हो जाता हूँ तो मन करता है कि फिर से बच्चों जैसा बनकर तुम्हारे गले से लिपट खूब रोयूं और कहूँ कि माँ "आई एम सॉरी" मैं तुम्हारे लिए इतना भी ना कर सका । मैं तुम्हारे हाथों से ढेर सारी मार खाना चाहता हूँ, कम से कम वो दर्द तो उस मार में जाता रहेगा । मैं चाहता हूँ कि कई कई दिन यूँ ही तुम्हारे पास रहूँ, तुम से ढेर सारी बातें करूँ, बचपन से लेकर अब तक की सभी बातें। वो बातें जो आज तक मैंने किसी से नहीं की । वो बातें जिन्हें कहने से मैं डरता हूँ, जो मैंने अपने "बेस्ट फ्रैंड" से भी नहीं कह पायीं ।

मन करता है माँ कि उस पुलिस अफसर के सामने खड़ा होकर उसे अपने दिल की सारी बातें कह डालूं और कहूँ कि बिना सहारे के जिंदगी जीने का सहूर क्या होता है ज़रा बताये । कैसे जी जाती है जिंदगी बिना पैसे, एक एक रोटी के लिए मोहताज़ होकर । मैं जानना चाहता हूँ उससे कि कैसे अच्छी अच्छी बातें कर सकता है कोई बुरे वक्त में भी । मैं उसी के लहजे में उसे एक लंबा भाषण देना चाहता हूँ, उसे घंटों अपने ऑफिस के बाहर खड़ा करके फिर अन्दर आने पर ढेर सारी उसूलों की बातें बताना चाहता हूँ।

मैं हर उस इंसान से उसी की वाली चालाकी की अदा से उसे चालाकी दिखाना चाहता हूँ और फिर उसे जी भर कर मुंह चिढाना चाहता हूँ । मैं चाहता हूँ कि वो बुरा माने और फिर दिखाने के लिए ये करे कि उसे बुरा नहीं लगा । मैं देखना चाहता हूँ उसके चेहरे पर उसी के जैसी चालाकी चलने के बाद के भाव ।

मैं आत्महत्या करने की सोचना चाहता हूँ और वो डर भी महसूस करना चाहता हूँ, मैं ये भी बताना चाहता हूँ कि बिना सफलता पाये मर जाने से मैं बहुत डरता हूँ । मैं डरता हूँ कि लोग मुझे डरपोंक, भगौड़ा और हारा हुआ कहेंगे । इस बात को अच्छी तरह जानते हुए भी मैं आत्महत्या के बाद के हालात देखना चाहता हूँ । लेकिन इन सबके बावजूद मैं आत्महत्या नहीं करना चाहता । मैं कोई भी ऐसी मौत नहीं चाहता जिसके बाद मैं कमज़ोर कहलाऊं ।

मैं तुमसे कह देना चाहता हूँ कि मैं तुमसे बहुत बहुत प्यार करता हूँ, उतना ही जितना कि बचपन में किया करता था । उतना हीं जितना कि तुम्हारा पल्लू पकड़ पीछे छुप जाने पर और खुशी से गले लग जाने पर जताता था । मैं कोई ऐसा ढंग खोजना चाहता हूँ जिससे मैं आसानी से सब कुछ बयाँ कर सकूँ...हर वो एहसास जो दबा कुचला है


मैं कहना चाहता हूँ माँ कि तुमने जितने भी ख्वाब देखे हैं, उन्हें पूरा करना चाहता हूँ । मैं कहना चाहता हूँ माँ, कि मैं कभी कभी बहुत उदास होता हूँ । हाँ माँ, मैं कह देना चाहता हूँ कि मेरे अन्दर बहुत कुछ ऐसा है, जो धीरे धीरे ज़मा होता रहा है-होता रहा है, पर आज तक दिल खोलकर किसी को भी नहीं कह सका...किसी को भी नहीं ।

जानती हो माँ मुझे ख़ुद को भी बताने में कभी कभी सोचना पड़ता है कि मेरे अन्दर क्या क्या है, जो बयाँ नहीं हुआ है । मैं दिल खोलकर बिना दिमाग की सुने, सब कुछ बयाँ कर देना चाहता हूँ...हर वो एहसास जो वर्षों से मेरे अंदर क़ैद है

* आतिशफ़िशाँ = ज्वालामुखी

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ख़ामोश सा अफ़साना !!

>> 06 December 2009

कभी कभी लगता है कि दूर तलक चली जाती खामोश सड़क पर मैं तुम्हारे हाथों में हाथ डाल कर यूँ ही खामोश चलता चलूँ-चलता चलूँ । कभी कभी खामोश रहना भी कितना सुकून देता है, है न । तुम्हें पता है कि जब ख़ामोशी जुबां अख्तियार कर लेती है तो बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो हमारे सीने में दफ़न होती हैं, उन्हें ख़ामोशी ख़ुद-ब-ख़ुद दूजे के दिल तक पहुँचा देती है । कितना आसान है न ख़ामोशी की जुबां को समझना, या शायद हमें समझने की जरूरत कहाँ पड़ती है, वो तो ख़ुद-ब-ख़ुद हमारे कानों में संगीत बनकर गूंजती है ।

एक अर्सा हुआ जब से कुछ खोया-खोया सा जुदा-जुदा सा लगता है । लगता है कि कुछ है, जो यूँ ही समझ नही आएगा । मन करता है एक बार फिर से वही सब करूँ, वही सब सुनूँ, वही सब महसूस करूँ जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ होता रहा । तुम्हें याद है न वो सब...याद ही होगा...अभी जैसे कुछ रोज़ पहले की ही सी तो बात है । जब तुम मेरे साथ साइकिल के अगले हिस्से पर बैठ कितनी खुश हुआ करती थीं । उन भेड़ों को हांकने वाले को जबरन परेशान करने के लिए तुम घंटी बजा दिया करती थीं । कैसे खिलखिला कर हँसती थीं तुम, जब वो बोला करता कि क्या दीदी आप भी ।

जब उस हलकी हलकी उग आई हरी घास पर लेटे हुए आसमान में देखा करते और हमारे बीच कई कई बीत गये हुए पलों तक बात न हुआ करती । कैसे हम एक दूजे के दिल का हाल जान लेते थे बिना कहे, जैसे तुम कहना चाहती हो कि देखो तो वो वाला बादल दूल्हा सा लग रहा है और वो देखो वो टुकड़ा दुल्हन, कितनी खूबसूरत लग रही है न। देखो दूल्हा कैसे मुस्कुरा रहा है । ऐसी कितनी ही तो बातें थी जो हमारे दरमियाँ उस ख़ामोशी में हो जाया करती थीं।

जब तुम करवट बदल मेरे सीने पर अपने सर को रख लेती तो सच मानों उस पल लगता मैं जन्नत में हूँ । नहीं जानता कि कैसी होती होगी, लेकिन इससे अच्छी तो नही होगी न । तुम हो, मैं हूँ, हमारी बातें हैं, बेफिक्री वाला दिन, खुला आसमान, हरी घास, मदमस्त उड़ते से रंग बिरंगे पंछी, वो तितलियाँ और वो तुम्हारे झूठ बोलकर घर से बनाकर लाये हुए मेरे लिए परांठे । कभी तो लगता है कि जन्नत भी क्या ख़ाक होगी इसके आगे ।

जब तुम घास के तिनके को बार बार तोडा करतीं तो पता लग जाता कि कुछ सोच रही हो, किसी उलझन में हो । हर बार ही तो मैंने तुम्हें इसी तरह उलझन में पाकर तुम्हारे हाथों को अपने हाथों में लेकर और तुम्हारी आंखों में झाँककर पूँछा, कि क्या बात है और तुम भी न कह देतीं कि कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं । लेकिन अगले ही पल कैसे तुम सभी बातें कह दिया करती । तुम्हारी वो बातें, ढेर सारी बातें, प्यारी प्यारी, अपनी सी, भोली सी, मासूम सी । जिनसे मुझे उतना ही प्यार हो चला था जितना कि तुमसे, तुम्हारी प्यारी आंखों से, तुम्हारी उस मुस्कराहट से, तुम्हारी उन बच्चों जैसी हरकतों से था । सच में वो ख़ामोशी भी बहुत खूबसूरत हुआ करती थी । अपने अपने हाले-दिल बयाँ करने के लिए सबसे खुशनुमा, सबसे संजीदा और बिल्कुल अपनी सी ।

तुम्हें पता है कि उस ख़ामोशी में हम अपने सारे गम, सारी खुशी बाँट लेते थे । वो ख़ामोशी हमारी दोस्त हो जाया करती थी । उस ख़ामोशी के बने हुए तमाम अफ़साने हैं, जो मेरे जहन में जब तब यूँ ही आ जाया करते हैं और मैं मुस्कुरा जाया करता हूँ । ठीक उसी मुस्कराहट के जैसे जो तुम्हें सबसे अज़ीज थी । क्या वो खामोश से अफ़साने तुम्हारे पास भी आते हैं गुफ़्तगू करने...

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ब्लॉगिंग से संबंधित कुछ ग़लतफ़हमियाँ

>> 04 December 2009

हमारे एक मित्र थे बिल्कुल लखनऊ की नज़ाकत और नफ़ासत लिए हुए. वो अक्सर एक ज़ुमला इस्तेमाल किया करते थे " ये शरीफ़ हैं, इनकी शराफ़त की तो..." अब डैश-डैश पर मत जाइए. उसमें बहुत कुछ छिपा है, अजी मान लीजिए कि बहुत कुछ छिपा रहता है इस डैश-डैश में. मसलन... अजी गोली मारिए मसलन को. आप तो ख़ामाखाँ हमें पिटवाने पर तुले हैं मियाँ. अब जो कहीं हमारे उन नज़ाकत और नफ़ासत वाले भाई जान ने पढ़ लिया तो हमारी तो आ जाएगी ना शामत.
अब ये जिस तरह लोगों को शरीफ होने की ग़लतफहमी होती है ना, वो बहुत दूर तलक जाती है. अब कितनी दूर तलक जाती है, वो हमने कोई नापी थोड़े ना है! कमाल करते हैं आप भी. अब आप भी देखिए, आप आए थे हमारे यहाँ ब्लॉगिंग के बारे में जानने और हम भी क्या ले बैठे ? ना जाने क्यों शराफ़त के चोचले ले बैठे. तो ये शराफ़त की बात छोड़ते हैं फिर कभी फ़ुर्सत से करेंगे.

तो मियाँ ब्लॉगिंग तो बात ऐसी है ज़नाब, अच्छा चलो मोहतरमां भी, अब खुश सभी. कुछ ग़लतफ़हमियाँ ऐसी हैं जैसे कि :

1. लोग हमें सबसे ज़्यादा इसलिए पढ़ते हैं कि हम बहुत अच्छा लिखते हैं

रहने दीजिए ज़नाब/मोहतरमां अगर सभी लोग सबसे ज़्यादा अच्छा पढ़ने के चक्कर में आते हैं तो ऐसा नही है. ऐसे कई हैं जो बहुत बहुत अच्छा लिखते हैं और जहाँ गिनी चुनी दस्तक ही दिखाई देती हैं और फिर अच्छे लिखे हुए से तो किताबें भरी पड़ी हैं, पुस्तकालय भरे हुए हैं खचाखच.

किसी को पढ़ने लोग ज़्यादा इसीलिए आते हैं कि उसने पाठकों को महत्व दिया, उससे संबंध स्थापित किया, उनकी टिप्पणियो का जवाब दिया, उनके सवालों का जवाब दिया. धीरे-धीरे संबंधों को आत्मीय बनाया. समय समय पर, समय के हिसाब से विषय वस्तु बदली, पाठकों को काम की बातें भी बता कर चले. इन सबके साथ साथ मूल्यवान सामग्री भी प्रस्तुत की.

2. अगर मैं ये लिखूं तो लोग आएँगे

ऐसा कहाँ होता है जनाब. जब तक लोगों को पता ही नही होगा तब तक कहाँ पढ़ा जाएगा. आपकी उपस्थिति होना अनिवार्य है कि हाँ आप मौजूद हैं और आपने फलाँ बात लिख दी है. मान के चलिए अगर किसी जंगल में कोई पेड़ गिरता है और अगर वहाँ कोई नहीं तो क्या वो आवाज़ करेगा. या कोई अच्छी फिल्म आकर चली जाए बिना विज्ञापन के तो क्या आपको पता चलेगा कि वह अच्छी थी या बुरी. कई दिनों और महीनों बाद पता चलेगा कि वो अच्छी थी. देख लो भैया अब. अरे हाँ वो ज़नाब के साथ मोहतरमां भी जोड़ लें :)

3. आप बहुत सारा पैसा कमा लेंगे

अब ये ग़लतफहमी तो आप पाल ही नहीं सकते कि हिन्दी ब्लॉगिंग से आप पैसा कमा के अमीर बन जाएँगे. तो मियाँ इन सब चक्करों में अभी ना पड़ें और दिल खोलकर बिना किसी चक्कर के हिन्दी ब्लॉगिंग करके हिन्दी को बढ़ाने में योगदान दें. जो कुछ भी दे सकते हैं दे ही दीजिए, कम से कम आपके पास रखा रखा खराब तो नहीं होगा ना.

हाँ एक बार हमने अपने उन नज़ाकत और नफ़ासत वाले भाई जान को अनिल कांत के बचपन की प्रेमकहानी सुनाई. तो वो बोले "ये शरीफ हैं, इनकी शराफ़त की..." क्या कहा कौन अनिल कांत ? अमाँ यार रहने दो ऐसे ऐसे सवाल नहीं पूँछते, अच्छा नही लगता, अब ऐसे में वो बुरा मान गये तो. अब कुछ तो उनके बचपन की इस शराफ़त को जानते हैं, अरे मतलब पढ़ चुके हैं. अब जो जो रह गये हैं वो इस नन्ही सी गुमनाम मोहब्बत लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

बाकी जनाब/मोहतरमां ग़लतफ़हमियाँ तो ना जाने कितने कितने तरह की होती हैं. सब गिनायी नहीं जा सकती ना. कुछ एक आपकी नज़र में हों तो बतायें ताकि हम सबका भला हो सके. क्या कहते हैं ?

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आपके ब्लॉग के दिन खराब होने के 10 लक्षण

>> 03 December 2009

1. यह टिप्पणी प्राप्त होना कि "बहुत खूबसूरत रचना/ भावपूर्ण रचना/ Nice Post"

जब आपको इस तरह की टिप्पणी प्राप्त हो तो इसका तात्पर्य यह है कि पढ़ने वाले के पास आपकी पोस्ट के बारे में कहने को कु्छ नही है या बहुत से ब्लॉंगर सिर्फ़ बिना पढ़े अपनी अधिक से अधिक टिप्पणी दर्ज कराना चाहते हैं. इसका मतलब यह भी निकलता है कि आप ने इतना रोचक नही लिखा कि पाठक दिलचस्पी ले.

2. आगंतुकों के साधारण आँकड़े

आप बहुत से ब्लॉग पढ़ते हैं और अपनी टिप्पणी भी वहाँ छोड़ते हैं लेकिन फिर भी आपके ब्लॉग पर लोग नही आते. आप उनके ब्लॉग पर की गयी टिप्पणी से उनसे बेहतर संवाद स्थापित करें, उनसे प्रश्न करें तो बेहतर स्थिति बनेगी.


3. कम सब्स्क्राइबर(ग्राहक)

0, 2, 5 सबस्क्राइबर ही हैं और बढ़ नही रहे. मतलब आप बहुत काम की सामग्री या दिलचस्प सामग्री पेश नही कर रहे जिसके आने का इंतज़ार पाठक को रहता हो.


4. अपने व्यस्त होने की बार बार ख़बरे देना

# दोस्तों मैं आजकल शहर से बाहर चल रहा हूँ इसीलिए ब्लॉगिंग नही कर रहा.

# दोस्तों पुनः माफी चाहूँगा आजकल मेरा कंप्यूटर खराब चल रहा है जिस कारण में कु्छ पोस्ट नही कर रहा.

# मैं वादा करता हूँ कि बहुत जल्द में कु्छ लिखूंगा, पक्का वादा.


5. एक लंबी श्रंखला आपके विज्ञापन से भरी होना

कई बार आपने ढेर सारी जगह विज्ञापन से ही भर रखी होती है और पाठक को पढ़ने में परेशानी का अनुभव होता है.


6. आपका ब्लॉग खुलते ही Popups का खुल जाना

या तो आपका ब्लॉग खोलते ही popups का खुल जाना या टिप्पणी के लिए क्लिक करते ही नयी खिड़की खुल जाना.

7. Autoplaying Audio

किसी ऑडियो का आपकी पोस्ट में या ब्लॉग में लगा होना जो अपने आप शुरू तो हो जाता है लेकिन उसे बंद करने का कोई समाधान नही होता.

8. Errors

आपका ब्लॉग खोलते ही इस तरह की समस्या आना और उनका लंबे समय तक बने रहना
* 404 Not Found
* Headers already sent
* Error establishing a database connection
* This account has been suspended
* Blog has been removed

9. Visitors का ब्लॉग पर आना लेकिन उसका टिप्पणी न करना. कई बार ऐसा होता है कि पाठक पढ़कर चला जाता है और टिप्पणी नही देता. इसके पीछे वजह हो सकती हैं कि आपने ऐसे विषय पर पोस्ट लिखी हो जिसके बारे में वह कुछ कहना न चाहता हो या पहले वह टिप्पणी करता आया हो लेकिन उसे उनमें पूँछे गये सवालों के जवाब ना मिले हों, आपका पाठक के साथ बेहतर संवाद ना हो

10. लगातार ऐसी ही पोस्टों का लिखना जिनमें पाठक को दिलचस्पी ना रही हो.

अतः इन सभी कमियों को दूर करके आप अपने पाठक बढ़ा सकते हैं और अपने ब्लॉग में जान डाल सकते हैं.

# वैसे आप लोगों ने मेरी पिछली पोस्ट "लेखक की मृत्यु" नही पढ़ी

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लेखक की मृत्यु

>> 01 December 2009

लेखक मुझे लिखना चाहता था या यूँ कहूँ कि मेरे बारे में लिखना चाहता था. उसने एक कहानी बुननी चाही थी और वो चाहता था कि मैं उसकी कहानी का हिस्सा बनूँ. एक ऐसा हिस्सा जिससे कहानी का नज़रिया बदल जाए.

वो चाहता था कि मैं उसका नायक बनूँ, एक ऐसी कहानी का नायक जो न तो मैंने सुनी थी और न ही उसने ठीक से सोची थी. इन सबके बावजूद वो मुझे नायक बनाना चाहता था, अपनी कहानी का नायक. मेरी नज़र में नायक कई तरह के होते थे. एक वो जो पूरी कहानी पर छाये रहते हैं और एक वो जिन पर पूरी कहानी छायी रहती है. पर मुझे इन सब से क्या ? मैं क्यों इस तरह से सोचने लगा, न तो मुझे नायक बनने में दिलचस्पी थी और ना ही ये सोचने में कि अगर वह मुझे नायक बनाएगा तो किस तरह का नायक गढ़ेगा. मैं सोच ही रहा था कि उसने मुझसे पूँछा "क्या सोच रहे हो ?" मैंने कहा "मुझे दिलचस्पी नहीं और फिर मैं क्यों बनूँ नायक तुम्हारी कहानी का, जबकि मैं जानता तक नहीं कि कहानी क्या है ?" वह काफी देर तक सोचने की मुद्रा में मुझे देखता रहा और फिर उसने सिगरेट जला ली. फिर होश में आते हुए मेरी आँखों में झाँकते हुए पूँछा "तुम जानते हो कोई कहानी, कोई ऐसी कहानी जो अब तक ना लिखी गयी हो"

मैंने उसे आश्चर्यचकित होते हुए देखा, उसकी सफ़ेद बढ़ी हुई दाढ़ी जोकि शायद उसके लेखक होने का पक्का सबूत देने के लिए अभी तक मौजूद हो, उसकी आँखों पर एक चश्मा रखा हुआ था जिसके उस पार दो आँखें मेरे चेहरे पर मेरे उन होठों के खुलने और फिर बंद होने का इंतजार कर रही थीं. मैंने कहा "नहीं मैं कोई भी कहानी नहीं जानता. आप कैसे लेखक हैं जोकि बिना कहानी सोचे कहानी के नायक की तलाश में जुटे हुए हैं. जब आपके पास कोई कहानी ही नहीं तो नायक का क्या करेंगे" वो मुस्कुराया, उस पल ऐसा लगा कि उसकी सफ़ेद दाढ़ी में उसके लेखक होने के कई साल छुपे हुए हैं. वो बोला "क्योंकि मैं जानता हूँ कि मेरा नायक ही मुझे मेरी कहानी के प्रारंभ से अंत तक पहुँचायेगा" मुझे उसकी इस बात पर ताज़्जुब जैसा कुछ हुआ. फिर भी ठीक से याद नहीं कि वो ताज़्जुब ही था या उससे मिलता जुलता कुछ. मैंने उसे अपनी बात दोहरायी "नहीं मुझे दिलचस्पी नहीं" वो बोला "किस में कहानी कहने में या नायक बनने में ?" मैंने कहा "कि दोनों में से किसी में भी नहीं" वो होले से उठ बैठा और फिर माथे पर शिकन लाते हुए उस चाय को गर्म रखने वाले डब्बे से दो रखे हुए कप में चाय उड़ेल दी. मेरी ओर मेज पर बढ़ाते हुए बोला "अफ़सोस तो मैं नहीं कर सकता लेकिन तुमने कुछ तो किया होगा जिंदगी में, ऐसा कुछ जो कि कहने लायक हो, जिससे कहानी बन सके"

मैंने हैरानी से फिर उसे देखा और मन में जो सोच रहा था वही कहा "मैं तो यही सोचता था कि लेखक के पास बहुत कहानियाँ होती हैं या वो जब चाहे कोई भी कहानी गढ़ सकता है और उसका लेखक होना ही इसी में है कि वह तमाम कहानियाँ गढ़ सके, उन्हें कह सके"

मैंने मेज पर रखे हुए चाय के कप को एक नज़र देखा फिर उसकी चाय की ली गयी एक चुस्की पर कहा " मुझे नहीं लगता कि यह कोई भी कहानी बन सकती है और ना ही मैं आपकी कहानी का नायक बनना चाहता. जो कुछ भी है या जो भी सच है वो मैं बता देना चाहता हूँ, क्योंकि आप सुनना चाहते हैं" फिर मैंने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा " मैं एक मानसिक रोगी हूँ, एक ऐसा मानसिक रोगी जिसका इलाज अधूरा रह गया" उसने दिलचस्पी दिखायी जैसे कि मैं कोई असाधारण बात कह रहा हूँ. फिर मैंने उससे आगे कहा -

"मैं एक मानसिक रोगी हूँ जोकि कभी सही रहता है और कभी मानसिक अवसाद का शिकार हो जाता है लेकिन मैं पहले ऐसा नहीं था. आपको जानकर ताज्ज़ुब होगा कि मैं एक वैज्ञानिक रह चुका हूँ. ठीक उसी तरह बातें किया करता और सोचा करता था जैसे कि आप सोचते और कहते हैं या शायद आप से बेहतर. मेरे विभाग को मुझ पर गर्व था और वो कहा करते थे कि मैं एक महान वैज्ञानिक बनूँगा. मैं सपने देखा करता था और खुश था. मेरी जिंदगी शुरू हुई थी और बहुत अच्छी रफ़्तार से चल रही थी.

आपको जानकार सुखद अनुभूति होगी कि मेरी उस अच्छी और सुखद जिंदगी में एक लड़की आयी. जो फूलों की तरह सुन्दर और किसी झरने की तरह पवित्र जान थी. मुझे उससे और उसे मुझसे प्यार हो गया. बिलकुल आपकी कहानियों की तरह. हम खुश थे, हमारे सपने थे और ढेर सारी खुशियों के साथ हम जिंदगी जीना चाहते थे. हम दोनों फिर एक साथ रहने लगे और अपने आगे के जीवन की भावी योजना बनाने लगे लेकिन एक साल बाद ही उसने एक नया साथी खोज लिया. वो बेवफा निकली. उसका स्वभाव दिलफेंक आशिक की तरह निकला जो कि अपनी महबूबा बदलता रहता है. उसे मुझमें दिलचस्पी नहीं रही थी. एक दिन वो मुझे छोड़ कर चली गयी.

मैं हमेशा उसकी यादों में रहता और उसी के बारे में सोचता. मैंने कई बार उससे बात करनी चाही. वो हर बार मुझसे झूठ बोल कर चली जाती. जब मुझे पता चला कि उसका नया आशिक कोई और नहीं मेरा नया बना हुआ दोस्त है. मैं धीरे धीरे मानसिक रोगी बन गया. लोग कहते कि मैं पागल हो गया हूँ. मैं उसी हालत में अपने घर में पड़ा रहता और उसी के बारे में सोचता रहता. एक दिन मुझे मेरे विभाग के लोग डॉक्टर के यहाँ ले गए और फिर मुझे सही हो जाने तक के लिए पागल खाने में भेज दिया गया.

मैं वहाँ कब तक रहूँगा न तो वो जानते थे और ना ही मैं. मैं पूरे दो साल उस पागलखाने में रहा. डॉक्टर कहते कि शायद अब में ठीक हो रहा हूँ या अब बहुत जल्द में ठीक हो जाउँगा और घर जा सकूँगा. यही बात मैं पिछले कई महीनों से सुनता आ रहा था. मैं तंग आ गया था उस पागलखाने से और उस सोच से जो मेरे साथ हरदम रहती थी. वो लड़की हरदम मेरी सोच पर हावी रहती थी. मुझे लगा कि अब शायद मैं कभी ठीक नहीं हो सकूँगा. मैं उस लड़की के बारे में सोच सोच कर और भी पागल होता जाता था. फिर एक दिन मैं उस पागलखाने से भाग निकला"

इसके साथ ही वो मेरे सामने बैठा सफ़ेद दाढ़ी वाला लेखक खाँसने लगा. उसने बहुत पहले ही अपनी चाय ख़त्म कर ली थी और मेरी पिछली ज़िन्दगी में खोया हुआ था. मैंने उससे पूँछा कि तुम बेहतरीन कहानी क्यों लिखना चाहते हो. वो कुछ देर सोचता रहा और फिर थोडा खाँसते हुए बोला "ताकि अच्छी कहानियों की खातिर मुझे याद रखा जाए और मैं इस साहित्य जगत में अमर हो जाऊं" मैं थोडा सा मुस्कुराया और कहा "अमर होने के लिए पहले लेखक की मृत्यु होना भी बहुत जरूरी है. उसकी कहानियां उसके मरने के बाद ज्यादा पढ़ी जाती हैं. लेखक की मृत्यु ही उसे अमरता प्रदान करती है" उसकी आँखें थोड़ी सी मुस्कुरायीं और माथे पर थोड़ी सी रेखाएं खिचीं. वो खांसते हुए बोला "फिर क्या हुआ ?" और फिर तेज़ खांसने लगा और इस बार उसके मुँह से खून आया. वो आश्चर्यचकित होते हुए खुद के खून को देखने लगा और अपने रुमाल से साफ़ करते हुए बैठ गया.

"फिर आगे नहीं जानना चाहेंगे आप" मैं बोला. वो अपनी खांसी की वजह से परेशान होने लगा. मैंने कहा "पता है फिर मैं पागलखाने से भाग कर सीधा अपने उस दोस्त के कमरे पर गया जो कि उस वक़्त किसी नयी लड़की की बाँहों में था. मैं उसके उसी कमरे के बाहर उसके अकेले होने का इंतज़ार करने लगा और जब वह लड़की चली गयी तो मैं उसके कमरे में पहुँच गया. वह मुझे देखते ही चौंक गया. मैंने उसे उसी बेरहमी से क़त्ल किया जिस बेरहमी से उसने मेरा जीवन क़त्ल किया था और बिना कोई सबूत छोड़े मैं वहाँ से चला आया" वो लेखक और ज्यादा परेशान होने लगा. उसकी खाँसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. बार बार खून आ रहा था.

मैंने अपने बारे में आगे बताते हुए कहा "उसके बाद मैं उस लड़की के पास गया. वो मुझे देखकर घबरा गयी. डरी सी, सहमी सी अपनी जिंदगी की भीख माँगने लगी. मैं उसे भीख तो दे देता लेकिन वो इस काबिल नहीं थी कि उसे भीख दी जा सके. मैंने उसे इतनी बुरी तरह क़त्ल किया कि पुलिस भी उसकी लाश को देखकर रोयेगी और जाहिर सी बात है कि मैंने बिना कोई सबूत छोड़े वो स्थान भी छोड़ दिया. मैं फिर से जाकर उस पागलखाने में रहने लगा ताकि जल्दी से ठीक होकर बाहर आ सकूँ"

अब वह खाँसी और खून उस लेखक की सहन शक्ति के बाहर हो गया था. वो बोला मुझे डॉक्टर के पास ले चलो. मैंने कहा "क्या आप जानना नहीं चाहेंगे कि वह लड़की कौन थी ?" उस लेखक ने अपनी आँखों से मेरी ओर प्रश्नवाचक चिन्ह बनाया. मैंने उसके सवाल का जवाब देते हुए कहा "वो तुम्हारी लड़की थी जिसने मेरे साथ ऐसा किया और मैंने उसका क़त्ल" लेखक की खांसी और मुँह से खून निकलने की कोई सीमा नहीं बची थी. वह तड़प रहा था.

मैंने मेज से दूसरा चाय का कप उठाते हुए और फिर चाय को नीचे गिराते हुए बोला "इसमें ज़हर था. क्या ये नहीं जानना चाहोगे कि मैंने तुम्हें जहर क्यों दिया ? क्योंकि मैंने तुम्हारी लड़की से वादा किया था कि मैं तुम्हारे बाप का ख्याल रखूँगा और उसकी हर इच्छा पूरी करूँगा. क्योंकि वो सिर्फ इसलिए नहीं मरना चाहती थी कि उसे तुम्हारी फ़िक्र थी और मैं वादा पूरा करने में यकीन रखता हूँ" मेरे सामने पड़ा लेखक खाँसते हुए चिल्ला रहा था और जो कुछ वो बोल सकता था वो उसके मुँह से आधा अधूरा निकल रहा था. मैंने उसके कानों में पास जाकर कहा "आज के बाद तुम अमर हो जाओगे. हमेशा के लिए अमर"

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अज़ीज़-अज़-जान लड़की

>> 25 November 2009

पेड़, पौधे, पत्तियाँ, फूल, खुले लम्बे दूर तक फैले खेत कहीं बहुत पीछे छूटते जा रहे हैं. खुले मैदानों में खेलते बच्चे, पल्लू को मुंह में दबाएँ मुस्कुराती वे स्त्रियाँ, बैलगाड़ी, खिली धूप ये सब एक एक करके पीछे छूट गए हैं. मैं तुमसे आखिरी विदा लेने के बाद से अब तक यूँ ही इस चलती ट्रेन की खिड़की से सब पीछे छूटते देख रहा हूँ. पता है तुम अब भी मेरे साथ हो. मेरे जेहन में बिलकुल इस हवा की माफिक.

अब जब कि मैं आ गया हूँ अपने इस अनिश्चितकालीन सफ़र पर तो तुम्हें लिख के भेज देना चाहता हूँ वो सब एहसास, वो ढेर सारी बातें जो तुम्हारे होने से होती थीं और तुम्हारे ना होने से याद बन जाती थीं. मैं वो सब कह देना चाहता हूँ जो मैं हर उस पल कह देना चाहता था, जब तुम मेरे साथ होती थीं, मेरे पास होती थीं.

तुम जानती हो कि मैं अक्सर तुम्हारे हाथों को अपने हाथों में लेकर उनकी रेखाओं को गौर से देखा करता और तुम पूंछती कि क्या देख रहे हो ? पता है हर बार ही मैंने उन रेखाओं में अपना नाम तलाशने की कोशिश की और मैं रेखाओं की भाषा कभी समझता कहाँ था भला. ठीक उसी तरह जैसे कि ये ना समझ सका कि मैं अपने एहसासों को बयाँ करने की जुबाँ कहाँ से सीखूँ.

हर बार ही कहना चाहने और ना कह पाने के बीच मैं खो जाता तुम्हारी उन बातों में जिन्हें तुम कभी बालों को संवारते हुए, हाथ की चूड़ी को घुमाते हुए और फिर मेरी आँखों में मुस्कुराते हुए देखकर कहती. मैं, मेरा दिल, मेरा दिमाग सब कहाँ गम हो जाते. ये मुझे तुम्हारे वहाँ से चले जाने पर उस फिजा में बिखरी हुई बातों में घुले हुए नज़र आते. जब होश आता तब तक तुम जा चुकी होतीं. मैं खुद पर ही बस मुस्कुरा भर रह जाता.

ऐसे में जबकि मैं जा रहा हूँ तुमसे उस जानिब जहाँ से लौट कर आने का वक़्त पहले से मुक़र्रर नहीं होता. मैं बयाँ कर देना चाहता हूँ अपने एहसासों को और इस दिल की धडकनों के बंद होने से पहले मैं कहना चाहता हूँ कि -

"ऐ अज़ीज़-अज़-जान लड़की मेरे लिए तुम इस सदी की सबसे खूबसूरत रूह हो."


* अज़ीज़-अज़-जान = जान से प्यारी

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संभव है तुम्हें ये निरर्थक लगे

>> 20 November 2009

संभव है तुम्हें यह निरर्थक लगे
कि
शाम होते ही लौट आते हैं
अँधेरे काले खौफनाक साये

और तुम होते हो
अपने घरों में बेपरवाह
ये सोचते हुए
कि हम सुरक्षित हैं


जब सोचे जाते हैं
दुनिया को मनमाने ढंग से
चलाये जाने के लिए
प्रजातंत्र की चाशनी में लिपटे हुए
राजनीतिक हथकंडे

और तुम थिरकते हो मदहोश होकर
अपने महबूब की बाँहों में
किसी डिस्को या बार की रंगीनियों में
लगाते हुए कहकहे

जब फैंके जाते हैं
सुबह की रोशनी में
संसद के अन्दर
गांधीनुमा नोटों के बण्डल
और दिखाए जाते हैं तीखे तेवर
कि संसद पर हमला
हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे

तुम रिमोट का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए
बढ़ जाते हो अपने गंतत्व पर
जहाँ आधुनिक गालियों से भरा समाज
करता है तुम्हारा इंतजार

संभव है तुम्हें ये निरर्थक लगे
कि
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु
कभी इस देश का हिस्सा थे

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हम कृष्ण भी हैं - हम राम भी

>> 19 November 2009

हम समझदार हैं
और होशियार भी

हम बनकर चाचा, ताऊ
फूफा और मौसा
लूटते हैं, खसोटते हैं
अपने ही घरों की स्त्रियों को
और
फिर देते हैं, उन्हें
अपने घर की
इज्जत की दुहाई


हम रचाते हैं रास लीला
भोगते हैं सुन्दरता
और फिर
दूर खदेड़ देते हैं
अपने ही घरों की स्त्रियों को

हम कृष्ण भी हैं
हम राम भी

हम देते हैं भाषण
स्त्री शक्ति पर
और फिर भोगते हैं
उसके शरीर को
बंद किसी होटल के कमरे में

हम बेईमान भी हैं
हम शैतान भी

हम लगाकर घात
बैठते हैं
अँधेरे किसी कोने में
लूटने को
किसी स्त्री की अस्मत
और
रखते हैं बंद कुण्डी में
अपने घरों की इज्जत

हम शैतान हैं
और
बनते भगवान भी

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एक स्कूटर की आत्मकथा

>> 06 November 2009

'खड-खडर-खडर' नीचे से आवाज आना शुरू हो गयी जो कि जाहिर है कि मिश्रा जी के स्कूटर की थी. थोडी देर में वो आवाज अपनी जवानी पर आ गयी और मिश्रा जी ठीक वैसे ही स्कूटर का कान अमैठने लगे जैसा गाँव के मास्टर जी कक्षा में खड़े लड़के के कान इस एवज में अमैठते हैं कि उसने 'कै निम्मा अठारह' का जवाब नहीं दिया और शांत खड़ा खड़ा जमीन को ताकता या आसमान को क्योंकि ठीक सरकार की तरह स्कूल की कक्षा के ऊपर भी छत नहीं थी, तो वो छत को ना ताक कर आसमान को ताकता है.

हाँ तो मिश्रा जी स्कूटर का कान अमैठते हैं और उस भरी पूरी कॉलोनी को पता चल जाता है कि 5 बज गए. पिछले 20 बरस से रोज़ का यही क्रम था और यही समय इसीलिए कालोनी की दीवारों, कुत्तों और इंसानों को भी ठीक वैसे ही आदत पड़ गयी थी जैसे कि चुनाव के आते ही मोहल्ले के बढे-बूढों को पैर छुलवाने की आदत पड़ जाती है.

कई बार लोगों ने कहा कि ये स्कूटर बेच दो और नया कोई साधन जुगाड़ कर लो. पर मिश्रा जी ठीक वैसे ही उस स्कूटर का इस्तेमाल आँख, कान और नाक बंद करके करते जा रहे थे जैसे हमारे देश के नेता हर बार चुनाव के लिए वही पुराना भाषण और भाषण देने का तरीका इस्तेमाल करते आ रहे थे और देकर जीत जीत कर संसद और विधान सभाओं की शोभा बढा रहे थे. नेता भी खुश, उस भाषण को देने में और सुनने वाले भी खुश, उस भाषण को सुनने में. न नेताओं को नया भाषण लिखवाना पड़ता और ना ही जनता को नया भाषण होने की वजह से ध्यान लगाना पड़ता.

कॉलोनी में ही रहने वाली श्रीमती दुबे ने अपने लड़के को आवाज दी उठ जा चिंटू जा दूध ले आ. क्या मम्मी अभी समय ही क्या हुआ है. पाँच बज गए और कितने बजे उठेगा देख तो मिश्रा अंकल स्कूटर ले जा रहे हैं. उनके इस बात के कहने के बाद ना चिंटू ने पूंछा कि आपको कैसे पता कि पाँच बज गए और ना ही श्रीमती दुबे ने कहा कि उन्हें कैसे पता कि पाँच बज गए. सारी कॉलोनी और कॉलोनी वासियों को पूरे 20 बरस से पता था कि मिश्रा जी सुबह 5 बजे ही अपना स्कूटर निकाल कर दूध लेने जाते हैं और वहाँ से नीम के पेड़ से दातुन तोड़ कर लाते हैं. उनका दूध लाना इतना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं था जितना कि नीम का दातुन लाना. ये कॉलोनी वाले भी जानते थे और वो दूध वाला भी कि मिश्रा जी उनके चबूतरे पर लगे नीम के पेड़ की वजह से यहाँ दूध लेने आते हैं.

उस रामदीन दूध वाले के पडोसी ठीक वैसे ही रामदीन से और उसके नीम के पेड़ से चिड़ते थे जैसे कि किसी नेता के किसी क्षेत्र से हर बार सांसद चुने जाने पर उसके विपक्षी नेता चिड़ते हैं. हर बार विपक्षी नेताओं की तरह जो कि उस क्षेत्र में जाकर हर बार चुनाव से पहले वोट के लिए गिडगिडाते हैं कि फलां नेता में क्या धरा है. हम उससे ज्यादा सुविधाएं देंगे, कम खायेंगे, बहुत विकास करेंगे, हर चौथे दिन अपने इस क्षेत्र में जीतने पर भी आयेंगे, दुःख दर्द सुनेंगे और उन्हें दूर करेंगे. रामदीन के पडोसी भी मिश्रा जी को बहकाते, फुसलाते और उनसे अनुनय विनय करते. लेकिन मिश्रा जी टस से मस नहीं होते. ना मिश्रा जी बदले पिछले 20 बरस से और ना ही उनका स्कूटर.

इन 20 बरसों में उस स्कूटर ने कई कारनामे किये थे. जिसमें 7 दुर्घटनाओं के केस थे. जिनमें कि या तो सामने वाला टूटता या फिर मिश्रा जी टूटते और अगर इन दोनों में से कुछ ना हो पाया तो स्कूटर टूटता. इसके साथ साथ इस मुएँ स्कूटर की वजह से उनकी धर्मपत्नी इन 20 बरसों में कई बार रूठ रूठ कर अपने मायके बैठ जाती. हालांकि ये स्कूटर उन्हीं की शादी में दहेज़ स्वरुप उनके पिताजी ने मिश्रा जी को दिया था.

बात ये नहीं थी कि मिश्रा जी को स्कूटर से ज्यादा प्यार था और धर्मपत्नी जी से कम बल्कि बात कुछ और ही थी. इसके पीछे बात ये थी कि कई बार मिश्रा जी अपनी धर्मपत्नी जी को अपने साथ ले जाते स्कूटर पर बिठाकर और कहीं रास्ते में भीड़ के आने पर धर्मपत्नी के अचानक स्कूटर से उतर जाने पर मिश्रा जी उन्हें वहीँ भूल से छोड़ आते. जब उन्हें पता चलता कि अरे धर्मपत्नी जी तो पीछे ही रह गयीं खड़ी हुईं कहीं 10 या 20 या 30 किलोमीटर. इधर मिश्रा जी इस मामले में भुलक्कड थे कि धर्मपत्नी जी पीछे बैठी हैं कि नहीं और उधर श्रीमती मिश्रा जी भी अपनी आदत की पक्की थीं कि कहीं जाम लगने की स्थिति में वो फ़ौरन उतरकर खड़ी हो जाती थीं. तो इस तरह कई बार वो रूठ जाती और अपने मायके चली जाती.

एक बार तो दोनों अपने मायके और ससुराल से वापस आ रहे थे कि बीच रास्ते में कहीं श्रीमती जी उतर गयीं और मिश्रा जी 20 किलोमीटर स्कूटर खींच लाये. तब श्रीमती जी भी नयी नयी थी और उनका गुस्सा भी नया नया. बस श्रीमती जी ने 20 किलोमीटर पीछे रह गए अपने मायके में फ़ोन लगाया कि मैं फलां जगह खड़ी हूँ मुझे ले जाइए. बस जब आगे के 20 किलोमीटर खड़े मिश्रा जी को पता चलता तो वो परेशान वापस दौड़ते और उनकी धर्मपत्नी जी मिलती उनके मायके. इस तरह से श्रीमती का रूठना 6 महीने से प्रारंभ होकर अब जाकर धीरे धीरे इतने सालों में शांत हो चला था. ठीक उसी तरह जैसे कि जनता ने आदत डाल ली है भ्रष्टाचार को सहने की, नेताओं के सही न होने की, पुलिस की घूसखोरी की और टीवी चैनलों में समाचार की जगह किसी अन्य कार्यक्रम की झलकियाँ देखने की.


इधर स्कूटर भी पिछले कुछ सालों से कई बार टूटा चुका था, बन चुका था और इस्तेमाल किया जा रहा था. ठीक वैसे ही जैसे हमारी सरकार टूटती है फिर कुछ पैसे खर्च करके बनती है और उसी तरह सुचारू रूप से चलती रहती है. कॉलोनी के लोग भी उस स्कूटर को झेलने के उसी तरह आदि हो गए थे जैसे हमारे देश की जनता टूटी फूटी सरकार को झेलने की आदत डाल लेती है.

भले ही पीठ पीछे कितनी ही बातें करे और अलग अलग समूहों में मिश्रा जी के टूटे फूटे स्कूटर की बुराइयां होती हों और हंसी उडाई जाती लेकिन सब फिर उसी तरह शांत पड़ जाते जैसे कि जनता हमारे देश के भ्रष्टाचार, पुलिस के रवैये, सरकार की दशा, महंगाई और बिजली पानी की समस्याओं के लिए आपस में गला फाड़ फाड़ कर चर्चाएं करते हैं और समूह से अलग होने पर अपने घर में बैठ टीवी देखती है, गाने सुनती है, सप्ताह के अंत में घूमने जाती है, अच्छा खाना खाती है और आराम से सो जाती है.

हर बार स्कूटर के ख़राब होने पर मिश्रा जी मैकेनिक के पास जाते और कोई न कोई बहाना बनाकर उसकी मरम्मत करवा कर उसे उसी तरह सुचारू रूप से चलाने लगते. ठीक वैसे ही जैसे कि हमारे नेतागण लाख बुराइयां होने पर भी हमारी सरकार के टूटने-बिखरने पर पैसा लगाकर, बातें बनाकर, लालच से, वादों से, दूर के सपने दिखा दिखा कर अपनी टूटी फूटी सरकार को या तो बचा ले जाते हैं या फिर से उसकी मरम्मत कर सुचारू रूप से चलाने लगते हैं.

कई बार पेट्रोल महंगा हुआ और कॉलोनी वासियों ने मिश्रा जी को हिदायत दी कि इसे बेच दो और नया खरीद लो काहे इसमें पैसे लगाते हो. ये तो सही एवरेज भी नहीं देता और परफॉर्मेंस की तो बात ही मत करो. मिश्रा जी भी मुंह में पान दबाकर टका सा जवाब देते हैं कि भैया हमें क्या बढ़ते हैं तो बढ़ने दो, हमारा पेट्रोल का खर्चा तो सरकारी खाते में जाता है. ठीक वैसे ही जैसे सरकार और उसके चलाने वालों की दावतों, मीटिंगों, और चाल चलन का खर्चा सरकारी खाते में जाता है.

तो मिश्रा जी का स्कूटर चला आ रहा है और चलता रहेगा जब तक जान में जान है. मिश्रा जी भी खुश, कॉलोनी वाले भी खुश कि सुबह 5 बजे का पता चल जाता है और कुत्ते भी खुश कि बेवजह भौंकना नहीं पड़ता.

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कि ये लोकतंत्र है

>> 02 November 2009

हम अंधे हैं
और बहरे भी

या हम देखना चाहते हैं
चंद कपडों में परोसी गयी
परदे पर नग्न स्त्री

और सुनना चाहते हैं
रेडियो पर पॉप संगीत
और अपनी सलामती की खबरें

हम इंतजार करते हैं
हमें मारने वालों के लिए
इन्साफ का

देखते हैं, सुनते हैं
और फिर भूल जाते हैं
लाल किले पर खड़े होकर
दिया जाने वाला भाषण

हमें बताया जाता है
बार बार
कि ये लोकतंत्र है

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दहलीज के उस पार

>> 28 October 2009

हम जानते हैं कि उस दहलीज पर हम फिर कभी नहीं पहुँच सकते जिसको पार करते ही हमारे वो सपने बिखरे पड़े हैं. जिसके उस पार एक एक करके चुने जाने लायक हजारों बिखरी पड़ी यादें हैं. हाँ वो यादें जिन्हें गले से लगाने को मन करता है. मन करता है कि उनसे हाले दिल पुँछ बैठूं. उनसे ढेर सारी गपशप करूँ. उनके साथ दिन भर खेलूं और रात को तारों के नीचे लेट उन्हें एक एक करके गिनने की होड़ करूँ. फलां तारा कितना अच्छा है या उसकी पता है वो कहानी थी जो कि नानी ने हमे उस रोज़ सुनाई थी.

हाँ उस दहलीज को बचपन की दहलीज कहते हैं. वो जो हमसे बहुत पीछे छूट चुका है और जब तब वो हमें दूर से मुस्कुराते हुए देखता है. कभी कभी तो लगता है कि वो कह रहा हो क्यों बच्चू हो गए बड़े, अब भुगतो, पहले तो जब हमारे साथ थे तब हमेशा बड़े होने की सोचा करते थे. अब हो गए न बड़े, बोलो क्या पा लिया और हम सोचते हैं कि उसकी इस बात का क्या जवाब दें, क्या कहें उससे.

बचपन की दहलीज के उस पार बहुत सारे सपने आज भी मौजूद हैं जो बचपन के साथ ही जाते रहे. बचपन था तो वो सपने थे जो हर दिन हमारे साथ रहते और हम उन्हें बड़ी संजीदगी से अपने पास रखते. उन्हीं सपनों के बीच एक नन्हा मुन्हा सा सपना हुआ करता था "ढेर सारे कंचे जीतने का सपना". हाँ जिन्हें अंग्रेजी में शायद मार्बल्स कहते हैं.

हम हर रोज़ सोचते कि काश कि ऐसा हो कि हमारा निशाना सबसे ज्यादा अच्छा हो जाए और हम सभी के सभी बच्चों के कंचे जीत लें. काश कि ऐसा हो कि हमारे पास ढेर सारे कंचे हो और हम उन पर फक्र करें कि देखा हमारे पास इतने कंचे हैं. बोलो हैं क्या तुम्हारे पास...कैसे होंगे तुम्हारा निशाना हम जैसा थोड़े है जो इतने जीत लोगे. लेकिन हमारा निशाना इतना अच्छा कभी हुआ ही नहीं कि हम अपनी कॉलोनी के सभी लड़कों से जीत पाते.

उधर बचपन में हमारा छोटा भाई जो हमसे तीन बरस छोटा हुआ करता था...हुआ करता था क्या...अभी भी है पूरे तीन बरस छोटा. इतना बड़ा निशानची था कि उसकी वजह से पूरी कॉलोनी में हाहाकार हुआ करता था. मजाल है कि उससे कोई जीत भी पाए. यूँ कह सकते हैं कि कंचों का बहुत बड़ा खिलाडी. माशाल्लाह उसका निशाना ऐसा था कि कितना भी दूर कंचा रखा हो वो उसको अपना निशाना बना लेता था.

और देखते ही देखते वो कब 2 किलो से लेकर 5 किलो के डिब्बे जीते हुए कंचों से भर लेता पता ही नहीं चलता और हम उसके उलट अक्सर उसी से लिए हुए कंचे बाहर जाकर हार जाते. तब वो माँ से कहता कि भैया हमारे सारे कंचे हार जायेंगे. देखो न माँ भैया को खेलने से मना करो. हम अब और कंचे नहीं देंगे. कई बार ऐसा हुआ कि उसके ठीक से पढाई में ध्यान न देने पर हमारे पिताजी उसके कंचों से भरा हुआ डब्बा दूर जाकर गुस्से में गटर में फेंक आते. लेकिन वो तीन रोज़ बाद ही फिर से तमाम कंचे इकट्ठे कर लेता.

बचपन धीरे धीरे अपनी पीठ पर बस्ता लाधे गुजर गया. हम और हमारा सपना भी शायद उस बस्ते में कहीं हो. किताबों के दरमियान उस मोरपंख के साथ रखा हुआ चला गया. जिसे बचपन में हम म्बदे चाव से रखते थे कि इसके एक से दो हो जाते हैं. भाई के जीतने पर अच्छा लगता था कि देखो तो कितना बड़ा निशानेबाज है. उधर जब कंचों का शौक उतरा तो क्रिकेट ने अपनी बाहें फैला दीं. उस में भी हमारे छोटे भाई ने ही कमाल दिखाया और हम अक्सर बहुत जल्दी आउट हो जाते. हाँ जब कभी अपनी टीम के विनिंग प्लेयर भले रहे हों लेकिन अपने भाई की तरह आलराउंडर नहीं. वो क्रिकेट में भी सबका चहेता था.

अक्सर ऐसा होता कि सोते से उठने से पहले ही कभी मैं उसका चेहरा बिगाड़ देता तो कभी वो मेरा. हमारा चेहरा देखकर पूरे घर में हंसी गूंजती रहती. कभी कभी तो हम भूत वाला चेहरा बनाकर ठीक एक दूसरे के सामने खड़े हो जाते और फिर जगाते कि उठो. उठते ही इतना डरावना चेहरा देखकर तो कोई भी डर जाता. फिर एक दूसरे को मारने को दौड़ते और जिसने शरारत की वो माँ के पीछे छुप कर चिढाता. जिसके साथ शरारत हुई वो माँ से शिकायत करता. माँ देखो इसने ऐसा किया, हम इसको नहीं छोडेंगे.

अब देखो तो आज इस दहलीज के पार कोसों दूर निकल आने पर वो सब बहुत याद आता है. वो भाई के गले में हाथ डालकर घूमना. साथ स्कूल जाना. एक ही झूले पर एक साथ झूलना. मेरा उसको तेज और ऊंचे झूले पर ना बैठने देना. अपना बड़ा होना जताना. स्कूल के बस्ते को टाँगे घर तक एक दूसरे का हाथ थामे चले आना. अब बहुत याद आता है. लगता है कि एक सुख जो हमसे दहलीज के उस पार रह गया.

अक्सर बचपन की दहलीज के उस पार हो आने का मन करता है. मन करता है कि एक दौड़ लगाऊं और पहुँच जाऊँ उस पार या ऐसी कोई कूद जिससे पार कर सकूं उस दहलीज को.

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बच्चन सिंह और बहू की विदा

>> 26 October 2009

एक बार की बात है कि गाँव में रहने वाले बच्चन सिंह की नयी नयी शादी हुई. शादी के कुछ दिनों बाद जो है अपनी बहू को लिवाने के लिए उनकी ससुराल से खबर आई. अब जो है बच्चन सिंह जो कि बहुत खाते थे, उनको उनकी अम्मा ने सख्त हिदायत दी कि देख बच्चू तू यहाँ तो बहुत खाता है. यहाँ की कोई बात नहीं लेकिन वहाँ अपनी ससुराल में जाकर खाने पर मत टूट पड़ना. चाहे जितना भी कहें खाने के लिए, लेकिन तू जो है बस दो टाइम ही खाना खाना. एक रात में और फिर सुबह.

बच्चन की अम्मा ने जो कि जानती थीं कि बच्चू खाली पेट तो रह नहीं पायेगा तो जो है उन्होंने रास्ते के लिए पूडी सब्जी बाँध कर रख दी और साथ ही गुड भी ढेर सारा बाँध कर रख दिया, कि अगर भूख लगे तो इसे खा लेना लेकिन वहाँ ससुराल में सभ्यता से पेश आना.

अब भाई बच्चन सिंह चल दिए उठाय पोटली, जो अम्मा ने बातें समझायीं वो उन्होंने बड़े ध्यान से कस कर दिमाग में बैठा लीं. सुबह के निकले बच्चन सिंह पैदल पैदल जो है अपनी ससुराल जा रहे हैं. कुछ घंटे चलने के बाद बच्चन ने सोचा कि चलो अब कुछ सुस्ताय लिया जाए. बच्चन सिंह को कुछ देर सुस्ताने के बाद भूख लगी तो उन्होंने कुछ पूडियां खा लीं और फिर उठाकर पोटली चल दिए. अब इस तरह चलते चलते बच्चन सिंह जो है दो-चार बार बीच में ठहरे होंगे तो उनकी जो है पूडियां रास्ते में ही ख़त्म हो लीं.

शाम तक चलते चलते उनकी ससुराल आ गयी. दूर से ही उनके छोटे साले ने देखकर दौड़ लगायी "जीजा आई गए"..."जीजा आई गए" और उनके हाथ में पकडे हुए थैले को लेने की कोशिश की, लाओ जीजा हम लये चलें. साले ने लाख कोशिशें की मगर बच्चन ने थैला नहीं दिया और खुद ही थैला पकड़ कर चलते रहे.

दरवाजे पर साली मिली वो भी थैला छीनने की कोशिश करने लगी कि लाओ जीजा अन्दर रख दें. अब बच्चन उस थैले को कैसे दे देते. उसमें तो बचा हुआ गुड था. अब यहाँ ससुराल आये हैं तो यहाँ ये थोड़े नहीं पता चलना चाहिए कि दामाद गुड साथ लेकर चला है खाने के लिए.

बच्चन जी की आते ही बड़ी आव भगत होने लगी. अन्दर सास को पता चल गया कि उनका दामाद आया है तो उन्होंने फट से अन्दर से नया चादर और दरी निकलवाई और खाट के ऊपर बिछावाया. साली ने हाथ पकड़ कर उन्हें खाट पर बैठाला और फिर अन्दर दौड़ती हुई गयी बताने के लिए, कि बड़ी बहन को बता दें कि उनके वो आ गए.

थोडी देर में साली शरबत लेकर आ गयी और जीजा को शरबत देते हुए बोली कि जीजा "हमाय काजे का लाये" और थैले को उठाने की कोशिश करने लगी. जीजा जी उछले और बोले देखो हमारी चीज़ को हाथ ना लगाओ कहे देते हैं...तुम्हारी बड़ी मजाक करने की आदत है हाँ.

किसी तरह साली थैले को छोड़कर अन्दर गयी और अन्दर जाते ही सास ने कहा कि जा दौड़कर बगल वाली काकी को बुला ला वो कम तेल में अच्छी पूडियाँ तल देती हैं. साली दौड़ती हुई बाहर चली गयी. अब जो है बच्चन जी को बड़े जोरों से भूख लग रही थी, तो उन्होंने अगल बगल देखा और पाया कि कोई नहीं तो थैले से गुड निकालकर खाने लगे. जल्दी से थोडा बहुत खाकर मुंह पौंछ पांछ कर बैठ गए कि कहीं कोई देख ना ले. इस तरह वो खाने बनते बनते कई बार गुड खा चुके.

थोडी देर बाद साला कहने को आया कि जीजा जी खाना खा लो. बच्चन जी ने मना कर दिया कि भूख नहीं है...थोडी देर बाद साली आई तो उसको भी मना कर दिया कि भूख नहीं है. भाई बड़ी परेशानी वाली बात...उसके बाद सास आई कि बेटा खाना खा लो तो उनसे बोले कि अभी भूख नहीं है. थक हार कर उनकी बहू को उनकी सास ने भेजा कि देख तो खाना काहे नहीं खा रहे. उनकी बहू आयीं और उनसे बोली काहे नखरा कर रहे हो...काहे नहीं खानों खाई लेत. भाई अब बच्चन को जाना पड़ गया.

अब अन्दर जाकर वो खाने के लिए बैठ गए...रसोई में काकी पूडियाँ तल रहीं और खिड़की पर खड़ी खड़ी उनकी बहू देख रही कि खा रहे हैं कि नहीं. इधर बच्चन एक पूडी का एक कौर कर रहे और जल्दी जल्दी खाना खाए जा रहे. उनकी ये हालत देख उनकी बहू को बहुत गुस्सा आया..उन्होंने इशारे से बच्चन को उँगलियों से बताया कि एक पूडी के दो कौर करके खाओ. पर बच्चन तो कुछ और ही समझ बैठे. वो दो पूडियों को एक साथ खाने लगे. उनकी बहू ने माथा ठोंका...और इशारे से समझाया कि जैसे मर रहे थे वैसे ही मरो.

जैसे तैसे रात कटी और सुबह फिर वही हाल बच्चन को फिर भूख लगने लगी. अन्दर वालों को 2 बार मना कर चुके नाश्ते के लिए. यहाँ चुपके चुपके गुड खाए जा रहे. तभी उनका साला आ गया. इनके मुंह में गुड था, इन्होने मुंह बंद कर लिया. इनका एक गाल फूला हुआ देख साला बोला का खाई रहे जीजा जी. ह्म्म्म...ह्म्म्म....करके गर्दन ना में हिलाने लगे. वो अन्दर भाग कर गया और साली को बुला लाया...साली से भी कुछ नहीं बोल पा रहे बच्चन जी...बोले कैसे मुंह में तो गुड ठूंस रखा था और सबके सामने खोल भी नहीं सकते कि चोरी जो पकड़ी जाती.

इस तरह बात का बतंगड़ बन गया, उनकी सास आ गयीं और फिर रोना धोना शुरू कि पहले बखत दामाद आये और यहाँ बीमार पड़ गए. ना जाने क्या हो गया है दामाद को. उनकी बहू रोये सो अलग. बच्चन उनके सामने मुंह भी नहीं चला पा रहे. उनकी सास ने गाँव के डॉक्टर को बुला लिया. डॉक्टर आया उसने उनके मुंह का मुआयना किया. जब वो एक गाल पर उंगली करें तो बच्चन गुड को दूसरे गाल की तरफ कर लें और जब दूसरी तरफ करें तो इस गाल को कर लें. डॉक्टर ने कहा भाई चलता फिरता फोड़ा हो गया है आपके दामाद को.

सास बोली डॉक्टर साहब "हमाई दामाद को ठीक करि देओ"..चाहे जितना दाम लगे..डॉक्टर बोला कि इनका तो ऑपरेशन करना पड़ेगा और डॉक्टर ने वहीँ कहा कि फोड़ा फोड़ना पड़ेगा. उन्होंने बच्चन के मुंह को दोनों हाथों से पकडा और जोर से दबा दिया. बाहर गुड की धार निकली जो सीधे डॉक्टर के मुंह पर गयी. थोडी देर बाद डॉक्टर उछालते हुए बोला. वाह मैंने नयी खोज कर ली. अब मैं अपनी रिसर्च में लिखूंगा कि फोड़ा पक जाने पर मीठा होता है. अब गाँव में जितने भी लोग वहाँ एकत्रित हुए थे थे, सब डॉक्टर की जय जयकार करने लगे. उधर बच्चन की जान में जान आई कि चलो बच गए. वरना अगर पकडे जाते तो न जाने क्या होता. डॉक्टर को सौ रुपये देकर सास ने विदा किया.

बच्चन को उनकी बहू समेत बड़े लाड प्यार से कुछ घंटों में उनकी सास ने विदा किया. इस तरह बच्चन उर्फ़ बच्चू अपनी माँ की हिदायतों सहित अपनी बहू को ससुराल से लिवा लाये.

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मेरे कमरे की दीवार

>> 24 October 2009

संभव है तुम्हें ये बहुत अजीब लगे...कि आजकल मैंने अपने कमरे की दीवार से दोस्ती कर ली है...जब थक जाता हूँ तो यूँ ही मुझे निहारा करती है और मुझसे ढेर सारी बातें करती है...हाँ वो सभी बातें जो मैं करना चाहता हूँ...वो ध्यानमग्न होकर मेरी बातों में खो जाती है...पता है अब तक की गयी उससे सभी बातें उसे याद हैं...और जब तब वो मुझे उसी दुनिया में ले जाती है जहां वो सभी सपने और वो सभी बातें बिखरी पड़ी होती हैं...वो हर बात से मेरी मुलाकात कराती है

अभी कल ही तो देखा था मैंने अपने कमरे की दीवार को...बिलकुल एकटक मुझे प्यार से देखे जा रही थी...निगोडी को जरा सी भी शर्म नहीं आती...आये दिन ऐसे ही मुझे देखती रहती है...शायद मेरी आदत उसे भी लग गयी है...मैं भी तो उसे यूँ ही एकटक देखता रहता हूँ...उसमें कुछ खोजता सा...शायद वो बातें...वो पुरानी यादें...

शायद तुम्हारा चेहरा...या शायद वो गुलाब जो मैंने पहली रोज़ तुम्हें दिया था...वो हवा में उड़ते हुए बाल जिनमें उस गुलाब को मैंने लगाया था...वो सब मुझे दिखाती है...शायद ऐसा लगता है कि वो कोई सिनेमा का पर्दा है और उसके पीछे हसीं ख्वाबों से सजी हुई दुनिया है जो रील बाई रील चल रही है...कहीं आगे बढ़ने या पीछे करने की जरूरत नहीं पड़ती...वो मुझे वही सब दिखाती है जो मुझे देखना है...पता नहीं उसे कैसे मालूम कि मैं यही देखना चाहता था

उसने भी तो वो सब कुछ याद कर रखा है...और उसके पास हर वो तमाम यादों को याद कर कर मेरे सामने लाने का तजुर्बा होता गया है...उसे सब कुछ याद है...तुम्हारी और मेरी उससे चिपकी हुई ढेर सारी बातें मुझे कल ही उसने मेरा हाथ पकड़ कर स्पर्श करायीं...जो हमने देर रात तक उससे अपने अपने सर को टिकाकर आपस में की थीं.

वो तुम्हारी उँगलियों के स्पर्श से बनी तमाम कलाकृतियाँ मुझे मुस्कुराती सी नज़र आती हैं. तुम्हारे नयनों से उधार लिए गए रंगों को वो आज भी बदस्तूर संभाले हुए है...हर रोज़ एक नया रंग नज़र आता है मुझे उसमें...हाँ तुम्हारा रंग...प्यार का रंग...ख़ुशी का रंग...तकरार का रंग...तुम्हारे होठों का रंग...तुम्हारे ख्यालों का रंग...उस एहसास का रंग जो साथ होने से बनता है.

कल ही वो इन तमाम रंगों में रंगी मुझे इन्द्रधनुष सी जान पड़ी...और बाहें फैलाए मुझे अपने आप में खोयी हुई दुनिया मेरे सामने ले आई...हाँ वही सब कुछ तो था...खुला हुआ दूर तक आसमान...महकते हुए गुलाब...बिखरे पड़े फुर्सत के लम्हे...तितलियों की तरह आपस में बातें करती हवा में उड़ती तेरी मेरी बातें...और तुम्हारे दामन से लिपटा हुआ में...वो तुम्हारे उँगलियों का मेरे सीने पर बेतरतीब सी शक्लें बनाना...और बिलकुल पास महसूस होती हुई तेरी मेरी साँसे...और घुलती हुई खुशबू.

हाँ मेरे कमरे की दीवार आज भी सब कुछ संभाले हुए है...आज भी वो उस एहसास को साथ लेकर रहती है...जो तेरे और मेरे होने से बनता है...जो स्पर्श से बनता है...जो साँसों के घुलने से बनता है...जो आपस में बात करती हुई तेरी-मेरी बातों से बनता है

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दायरों से जुदा !! होने के एहसास के करीब

>> 15 October 2009

जब रिश्तों को निभाने वाले बड़े हो जाए और रिश्तों के दायरे छोटे । तब काश ऐसा हो पाता कि माँ जिस तरह छोटे पड़ गए स्वेटर को उधेड़ कर फिर से नए सिरे से बुनती और हम उसे बड़े चाव से पहनते । ठीक उसी तरह अगर रिश्तों को भी सहेज कर रखा जा सकता तो कितना अच्छा होता या सही कहूँ तो उस एहसास को जिन्हें लोग रिश्तों का नाम देते हैं ।

पर तुम्हारा और मेरा रिश्ता क्या था । ये मैं तब भी सोचता था और आज भी सोचता हूँ । क्या हमने अपने रिश्ते का कोई दायरा भी बनाया था । मुझे ठीक से याद नहीं कि इस पर भी हमारी कभी बात हुई हो या शायद हम इन सभी रिश्तों से अलग कहीं जुड़े हुए थे । कहीं किसी कोर पर गहरे से गाँठ बंधी हुई थी । जिसको देख पाना और समझ पाना कभी बहुत आसान जान पड़ता तो कभी मालूम ही न चलता कि भला रिश्तों का भी ऐसा कोई बंधन होता है ।

एहसास को नाम देना मैंने तुमसे ही सीखा । तुम्हारे पास हर एहसास के लिए एक नाम जो हुआ करता था । हर एहसास का नाम कितना जुदा था । जो इस दुनिया के दिए हुए नामो से बिल्कुल नए । मुझे ठीक से याद है कि दर्द, ख़ुशी, दुःख, पीड़ा, हर्ष, इन सभी नामों से कितने अलग थे तुम्हारे दिए हुए नाम । उन एहसासों के नाम ।

इन दायरों के बाहर भी एक दुनिया है । ये तुमने ही मुझे बताया । वो दायरे जो हम खुद बना लेते हैं या हमें बने हुए मिलते हैं । तुम कैसे उन सभी दायरों के बाहर, हमेशा मुझे मुस्कुराती हुई खड़ी मिलती । हाँ तुम जब हाथ थाम कर मुझे उन दायरों से बाहर ले गयीं तो वो दुनिया अलग थी । जिसका एहसास करना तो बहुत आसान हुआ करता लेकिन तुम्हारी आँखों में झांकते हुए उन एहसासों को नाम देना उतना ही मुश्किल । हाँ बहुत मुश्किल ।

पर जब भी तुम साथ चलते हुए यूँ ही मेरा हाथ थाम लेती तो यूँ लगता कि मुझे उस एहसास का नाम मिल गया हो । तुम्हारे साथ उन भूले हुए दायरों और बहुत कहीं पीछे छूट गए रिश्तों के नाम को मैं याद ना तो किया करता और ना ही मुझे याद रहते ।

ऐसे कई अनगिनत तुम्हारे पूँछे गए सवालों को में अपने कुर्ते की जेब में संभाल कर रखता और तुम्हारे इंतज़ार में उन्हें बार-बार, एक-एक करके निकालता । शायद किसी सवाल का जवाब मुझे मिल जाए । हाँ उन सवालों में छुपी हुई, घुली हुई तुम्हारी यादों को में एक एक करके हाथ पर रखता और अपने चेहरे पर मल लेता । देखना चाहता कि तुम्हारी यादों के साथ मेरा चेहरा कैसा दिखता है । सच कहूँ तो मैं ठीक से आज भी अपने चेहरे को उन यादों के साथ महसूस करने की कितनी भी कोशिश करूँ वो चेहरा कहीं दिखाई नहीं पड़ता । शायद वो चेहरा तुम अपने साथ जो ले गई हो । हाँ साथ ही ले गई होगी । नहीं तो मुझे मेरा चेहरा यूँ अजनबी सा ना लगता ।

हाँ अगर कुछ याद रहता है तो वो पल जब तुमने उस रोज़ हमारे आस पास उन सभी एहसासों को बुला लिया था और हम रिश्तों के दायरों से बहुत दूर कहीं एहसासों की बसाई हुई दुनिया में खुद को पाया हुआ महसूस कर रहे थे । हाँ वो पल सबसे जुदा था । मैंने खुद को तो पाया ही, तुम्हें भी पा लिया था ।

रिश्तों के दायरों से दूर और तुम्हारे-मेरे एहसासों के नज़दीक, मैं तुम्हें आज भी खुद के साथ पाता हूँ । हाँ यही तो एक एहसास है जो सबसे जुदा, सबसे सुखद है और जो हमेशा मेरे साथ रहता है ।

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नोटपेड को डायरी बनाने का तरीका (बहुत आसान)

>> 12 October 2009

सोच रहा हूँ कि आज आपको कुछ तकनीकी बात बता दूं.
आप सदैव नोटपेड को किस तरह उपयोग करते हैं. उसमें कुछ भी लिख कर और उसका कुछ भी फाइल नेम देकर सेव कर देते हैं.

लेकिन अगर आप चाहते हैं कि जब भी आप उस नोटपेड को खोलें तो खुलने पर उसमें उस वक़्त का समय और तारीख लिखी हुई आये. फिर इस बार कुछ लिख देने और सेव कर देने के बाद अगली बार खोलें तो अगली बार का समय और तारीख व समय आये. तो दोस्तों ये बहुत आसान है.

आइए जाने कैसे ?

Step-1:

नोटपेड को खोलें और उस में .LOG लिख कर फिर अपनी मर्ज़ी से फाइल नेम डालकर सेव कर दें और नोटपेड को बंद कर दें.

Step-2:

अब उस नोटपेड की फाइल को खोलें, आपको उस वक़्त जो समय है वो लिखा हुआ दिखाई देगा और उस दिन की तारीख भी.

बस अब कुछ भी अपने मन का उसके नीचे लिखें और फिर इस फाइल को सेव कर दें और इस नोटपेड फाइल को बंद कर दें.

Step-3:

अब जब जब भी आप इस नोटपेड फाइल को खोलेंगे तो उस वक़्त का समय और तारीख उसमें लिखी हुई आएगी.

तो देखा किस तरह से आपने नोटपेड का एक डायरी की तरह उपयोग कर लिया.

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गुजरे हुए दिनों से सिफारिश !!

>> 09 October 2009

बचपन की सुबह बहुत प्यारी होती थी...सुखद एहसासों वाली सुबह जब तब याद आ ही जाती है. उन बचपन के दिनों में एक ख़ास दिन भी हुआ करता था जब माँ सुबह उठते ही मुझे बाहों में भर कर गोद में ले लेती और ढेर सारा दुलार करती. नहीं माँ मुझे और सोना है...थोडा और सोने दो न माँ...और माँ गोद में लेकर यूँ ही मुझे उठा लेती...आँगन में ले जाकर मुझे नहलाती और फिर अपने हाथों से कंघी करती और कुछ देर बाद उनके हाथ में एक थाली होती...माँ मेरा तिलक करती और मुझे खाने को मिठाई देती...स्कूल जाते हुए माँ मेरी जेब में 10 रुपये रखते हुए कहती कि चोकलेट खा लेना...तुझे पसंद है ना.

शुरू के दिनों में पता नहीं था कि इस ख़ास दिन क्या होता है और ना ही याद रहता कि ये ख़ास दिन कब आता है. लेकिन हमेशा एक सुखद एहसास लेकर आता वो दिन. उन दिनों स्कूल में अपनी क्लास में बच्चे अपने जन्म दिन पर टोफियाँ बाँटते या फिर मिठाई. उस दिन पता चलता कि फलां बच्चे का जन्म दिन है आज इस लिए वो टॉफी या मिठाई बाँट रहा है.

एक रोज़ स्कूल से लौटते ही मैंने माँ से पूंछा...माँ मेरा जन्म दिन कब आता है...माँ मुस्कुरा दी. बोली क्यों क्या हुआ...नहीं बताओ ना कि मेरा जन्म दिन कब आता है...माँ मुस्कुराते हुए और सुई का धागा मुंह से काटते हुए बोली तुझे नहीं पता...मैंने कहा नहीं तो...माँ ने मुझे गोदी में बिठाते हुए सर पर हाथ फेरते हुए बोला...जिस दिन मैं तुम्हारा तिलक करूँ समझ जाना कि उस दिन तुम्हारा जन्म दिन है. मैंने कहा पर माँ सभी बच्चे तो उस दिन स्कूल में टॉफी बांटते हैं अपने जन्म दिन पर, लेकिन मैं क्यों नहीं...माँ ने कहा तुम्हारे जन्म दिन की टोफियाँ कहीं और बांटी जाती हैं...मैं बोला कहाँ...वो बोली अबकी बार तुम खुद अपने हाथों से बाँट देना...मैं खुश होते हुए बोला अच्छा ठीक है.

कुछ रोज़ बाद एक खूबसूरत सी सुबह माँ ने मुझे दुलार करते हुए गोद में उठा लिया और नहलाने के बाद तिलक किया. मैं खुश हो गया...क्या माँ आज मेरा जन्म दिन है...हाँ, माँ बोली...माँ मुझे उस सुबह मंदिर ले गयीं और जब हम मंदिर के बाहर लौटे तो माँ ने जो फल खरीद रखे थे वो मेरे हाथों में देते हुए बोली कि सामने जो लोग बैठे हुए हैं ये उन्हें बाँट दो...मैंने उन्हें देखा वो बहुत असहाय और भूखे थे...उस रोज़ मुझे वो फल बाँटते हुए बहुत ख़ुशी मिल रही थी.

स्कूल जाते हुए माँ ने मेरी जेब में 10 रुपये रखे और बोला कि आज शाम को तुम अपने दोस्तों को बुला लेना खाने पर. मैंने माँ को मुस्कुराते हुए देखा...और माँ के गले लगते हुए उनके गाल पर चूमते हुए स्कूल को चल दिया. उस रोज़ मैंने अपनी क्लास में अपने दोस्तों को बताया कि मेरा आज जन्म दिन है और सभी को शाम को माँ ने घर पर खाने के लिए बुलाया है. इंटरवल में मेरी गर्ल फ्रेंड 'निगार' मेरे पास आई और बोली कि मैं तो नहीं आ पाऊँगी अनिल...सॉरी...मैंने पहले मायूस होकर जमीन की ओर देखा फिर मैंने अपनी जेब से 10 रुपये निकाल कर चोकलेट खरीद कर उसे खाने को दी...उसने आधी तोड़ते हुए मुझे दी...और मेरे गाल पर किस करते हुए कहा 'हैप्पी बर्थ डे'...मैं मुस्कुरा गया.

उस शाम वो मेरा पहला जन्मदिन था जो सामूहिक रूप से मनाया गया...और मेरे ढेर सारे दोस्त...अंकल-आंटी लोग आये...उस दिन बहुत कुछ 10 से जुडा हुआ था...मैं उस दिन 10 साल का था...उस दिन महीने का 10 वां दिन था...और महीना भी 10 वां था...और वो चोकलेट भी 10 रुपये की थी जिस के बाद मुझे 'बर्थ डे किस' मिली थी :)

कमबख्त ये 10 अक्टूबर जब भी आता है...अपने से जुडी ढेर सारी यादें मेरे आस पास छोड़ जाता है...माँ की गोद, माँ का ढेर सारा प्यार...बचपन के दोस्त...किशोरावस्था के किस्से...कॉलेज के यार और उनके साथ बिताई महफिलें...वो हुडदंग...सब कुछ ऐसा लगता है जैसे कि मेरे आस पास ही आकर बैठ गए हों...और मुस्कुरा रहे हों !!

चित्र: गूगल से

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